Ashadha Amavasya Vrat Katha And Significance In Hindi (आषाढ़ अमावस्या कथा): आषाढ़ महीने की अमावस्या को आषाढ़ी अमावस्या और हलहारिणी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन पवित्र नदी में स्नान करने और पितरों के नाम से दान-पुण्य करने का विशेष महत्व माना जाता है। मान्यता है इससे पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। जिससे जीवन में सुख-समृद्धि आती है। पंचांग अनुसार आषाढ़ अमावस्या 5 जुलाई की सुबह 4 बजकर 57 मिनट से 6 जुलाई की सुबह 4 बजकर 26 मिनट तक रहेगी। इस अमावस्या पर ध्रुव योग और शिववास योग का निर्माण भी हो रहा है। जिस वजह से इसका महत्व और भी ज्यादा बढ़ गया है। चलिए जानते हैं आषाढ़ अमावस्या की व्रत कथा।
Ashadha Amavasya Vrat Katha
आषाढ़ अमावस्या कथा (Ashadha Amavasya Vrat Katha)
आषाढ़ अमावस्या की पौराणिक कथा के अनुसार, स्वर्ग धाम में अलकापुरी नाम का एक नगर था जहां कुबेर नाम का राजा रहता था। राजा शिव का बड़ा भक्त था। शिव की पूजा के लिए उसका माली हर रोज फूल लाया करता था। एक दिन जब माली मानसरोवर से फूल लेने गया तो उस समय वह अपनी पत्नी के साथ हास्य विनोद करने लगा। जब राजा को उस माली का इंतजार करते-करते काफी समय हो गया तो राजा ने अपने सैनिकों को उसका पता लगाने के लिए भेजा। सैनिकों ने माली का पता लगा लिया और उसके बारे में राजा को बताया।
सैनिकों ने कहा अपनी स्त्री के साथ हास्य विनोद कर रहा है। यह सुनकर राजा बहुत क्रोधित हो गया। राजा ने सैनिकों को माली को तुरंत लाने की आज्ञा। माली राजा के पास पहुंचते ही कांपने लगा। राजा ने माली को श्राप दिया कि तू अपनी स्त्री के वियोग में तड़पेगा और मृत्यु लोग में जाकर कोहड़ी का जीवन जिएगा। राजा कुबेर के श्राप से माली स्वर्ग से पृथ्वी लोग पर चला गया। जहां आते ही उसके शरीर पर कोहड हो गया और उसकी स्त्री भी उसी समय अंतर्ध्यान हो गई। माली को पृथ्वी पर बहुत कष्ट झेलने पड़े। वह बिना भोजन और जल के इधर उधर भटकता रहा।
एक दिन घूमते घूमते वह मार्कंडेय ऋषि के आश्रम में पहुंच गया और वहां जाकर ऋषि के पैरों में गिर गया। ऋषि ने उससे पूछा कि तूने ऐसा कौन सा पाप किया है। जिससे तेरी ऐसी हालत हो गई है। तब हेम माली ने ऋषि को सारा हाल बता दिया। फिर ऋषि ने उसे आषाढ़ अमावस्या के व्रत के बारे में बताया जिसे करने से उसके सारे पाप नष्ट हो गए।
