Akhuratha Sankashti Chaturthi Vrat Katha (अखुरथ संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा): अखुरथ संकष्टी चतुर्थी की पौराणिक कथा के अनुसार एक बार रावण ने स्वर्ग के सभी देवताओं को जीत लिया था और संध्या करते हुए उसने बालि को भी पीछे से जाकर पकड़ लिया था। उस समय वानरराज बालि रावण से कहीं गुना अधिक शक्तिशाली थे उन्होंने रावण को अपनी बगल में दबा लिया और उसे किष्किंधा ले आए और अपने पुत्र अंगद को खिलोने की तरह खेलने के लिए दे दिया। अंगद ने रावण को खिलौना समझा और उसे रस्सी से बांधकर इधर-उधर घुमाने लगे। जिसकी वजह से रावण को काफी कष्ट हो रहा था।
दुखी होकर रावण ने अपने पिता ऋषि पुलस्त्य जी को याद किया। रावण की ये दशा देखकर उनके पुत्र को बहुत दुख हुआ और उन्होंने पता लगाया कि आखिर रावण की ये दशा कैसे हुई। उन्होंने मन में सोचा कि घमंड होने पर देव, मनुष्य और असुर सभी की यही गति होती है। लेकिन फिर भी पुत्र मोह में आकर उन्होंने रावण से पूछा कि तुमने मुझे कैसे याद किया? रावण ने कहा हे पितामह, मैं बहुत दुखी हूं, यहां सभी मुझे धिक्कारते हैं, आप मेरी रक्षा कीजिए और इस पीड़ा से मुझे मुक्ति दिलाइए।
रावण के पिता ने कहा कि तुम परेशान मत हो, जल्द ही तुम्हें इस बंधन से मुक्ति मिलेगी। तब उन्होंने रावण को गणेश जी का व्रत करने की सलाह दी और बताया कि पूर्वकाल में वृत्रासुर की हत्या से मुक्ति पाने के लिए इन्द्रदेव ने भी इस व्रत को किया था। यह व्रत बहुत फलदायी है और इसे करने से हर तरह के संकट दूर हो जाते हैं। पिता के कहने पर रावण ने संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया जिससे उसे बालि के बंधन से मुक्ति मिल गई।
