Aasha Dashami 2026 Today Vrat: सनातन धर्म के लोगों के लिए आशा दशमी व्रत काफी खास होता है, जिसका उपवास हर महीने शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को रखा जाता है। हालांकि, इस व्रत की शुरुआत आषाढ़ा माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि से होती है, जिसके बाद इसे लगातार कई महीनों तक रखना होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आशा दशमी के दिन देवी पार्वती और आशा देवियों की मुख्य रूप से पूजा की जाती है। देवी ऐन्द्री, देवी आग्नेयी, देवी याम्या, देवी नैर्ऋति, देवी वारुणी, देवी वायव्या, देवी सौम्या, देवी ईशानी, देवी अधः और देवी ब्राह्मी ही 10 आशा देवियां हैं, जिनकी सच्चे मन से पूजा करने से हर मनोकामना को पूर्ण किया जा सकता है। चलिए अब जानें आषाढ़ शुक्ल दशमी तिथि के समय, आज के शुभ मुहूर्त और आशा दशमी व्रत की कथा के बारे में।
आशा दशमी व्रत की कथा और शुभ मुहूर्त
आशा दशमी व्रत की तिथि
| तिथि | दिन | समय |
| दशमी तिथि प्रारम्भ | कल 23 जुलाई 2026 | सुबह 07:03 बजे |
| दशमी तिथि समाप्त | आज 24 जुलाई 2026 | सुबह 09:12 बजे |
आज आशा दशमी की पूजा के शुभ मुहूर्त
- ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:15 से सुबह 04:57 बजे तक
- अभिजित मुहूर्त: दोपहर 12:00 से दोपहर 12:55 बजे तक
- गोधूलि मुहूर्त: शाम 07:17 से शाम 07:38 बजे तक
- सायाह्न सन्ध्या: शाम 07:17 से रात 08:19 बजे तक
- अमृत काल: दोपहर 04:57 से शाम 06:44 बजे तक
- निशिता मुहूर्त: रात्रि 12:07 से रात्रि 12:48 बजे तक (25 जुलाई)
आशा दशमी व्रत की कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में निषध देश में नल नामक राजा का राज था। एक बार नल और उनके भाई पुष्कर के बीच लड़ाई हो गई, जिसके बाद दोनों ने युद्ध करने का फैसला किया। राजा नल बहुत ही जल्दी युद्ध में हार गए, जिसके बाद उन्हें अपनी पत्नी दमयंती के साथ राज्य छोड़ना पड़ा। दोनों के पास कोई सहारा नहीं था, इसलिए वो वन में रहने के लिए मजबूर थे। एक दिन राजा नल ने वन में स्वर्ण सी कांति वाले पक्षियों को देखा, जिन्हें पकड़ने के लिए उन्होंने उन पर कपड़े फेंके, लेकिन वो सभी वस्त्र लेकर उड़ गए। इससे राजा को बहुत दुख हुआ और वो अकेले ही वन में निकल पड़े।
कुछ देर बाद दमयंती जब नींद से जागी और राजा को अपने पास नहीं देखा तो डरकर रोने लगी और वन में उनकी तलाश के लिए निकल गई। वन में घूमते-घूमते दमयंती एक दिन चेदी देश पहुंच गई। जहां उसकी मुलाकात राजमाता से हुई, जिन्होंने उससे उसके बारे में पूछा। इस पर दमयंती ने कहा 'मैं शादीशुदा स्त्री हूं। मैं न तो किसी के चरण धोती हूं और न ही किसी का बचा हुआ भोजन करती हूं। अगर कोई मुझे प्राप्त करने का प्रयास करेगा तो वो आपके द्वारा दंडनीय होगा।' राजमाता ने दमयंती की बात मान ली और उसे अपने देश में रहने की इजाजत दे दी।
कुछ समय बाद दमयंती अपने माता-पिता के घर चली गई, जहां पर वो खुश नहीं थी। उसे अपने पति की बहुत याद आती थी। दमयंती एक दिन अपने माता-पिता के कहने पर एक श्रेष्ठ ब्राह्मण के यहां गई और उनसे कोई ऐसा दान व व्रत बताने को कहा, जिससे उसे अपना पति वापस मिल सके। फिर ब्राह्मण ने दमयंती को आशा दशमी व्रत के बारे में बताया। ब्राह्मण ने कहा ये ऐसा व्रत है, जो तुम्हारे सारे दुखों को दूर कर सकता है। साथ ही खोए हुए पति से भी मिलवा सकता है।
इसके बाद दमयंती ने सच्चे मन से आशा दशमी व्रत रखना आरंभ किया, जिसके कुछ समय बाद उसे अपना पति मिल गया। कहा जाता है कि इसी के बाद से आशा दशमी व्रत रखने की परंपरा शुरू हुई।
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