Ujjain: सिंहस्थ से पहले अखाड़ों में वर्चस्व की जंग! शैव–वैष्णव संतों के बीच बड़ी दरार, प्रशासन की बढ़ी चुनौती

सिंहस्थ महाकुंभ 2028 से पहले संत समाज में मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं और अखाड़ों के बीच वर्चस्व की जंग तेज हो गई है। शैव और वैष्णव संतों के अलग-अलग रास्ते चुनने से स्थानीय अखाड़ा परिषद दो हिस्सों में बंट गई है। यह परिस्थिति आगामी महाकुंभ की तैयारियों और प्रशासनिक तालमेल के लिए बड़ी चुनौती बनती दिख रही है।

Ujjain News: गीता का दु:खेष्वनुद्विग्नमना: सुखेषु विगतस्पृह:। वीतरागभयक्रोध: स्थितधीर्मुनिरुच्यते।। श्लोक आपने सुना होगा। इस श्लोक का अर्थ है कि दुःख होने पर जिसके मन में तनाव नहीं होता और सुखों प्राप्ति होनेपर जिसके मन में अति प्रसन्नता नहीं होती तथा जो राग, भय और क्रोध से सर्वथा रहित हो गया है, वही स्थिर बुद्धि मनुष्य मुनि कहलाता है। अब इस खबर पर गौर करिए। सिंहस्थ आने में कुछ वक्त शेष रह गया है और साधु संतों के अखाड़े युद्ध के अखाड़े बन गए हैं। वजह आप समझ ही गए होंगे। अखाड़े चाहते हैं कि सिंहस्थ में ज्यादा से ज्यादा काम उन्हें मिले, क्योंकि ज्यादा काम यानि ज्यादा प्रसिद्धि और वर्चस्व...

Before Simhastha Mahakumbh 2028, the battle for supremacy in the saint community

सिंहस्थ महाकुंभ 2028 से पहले संत समाज में वर्चस्व की जंग

शैव और वैष्णव संप्रदाय में अलगाव

सिंहस्थ महाकुंभ 2028 के पहले अखाड़ा परिषद में दो फाड़ हो गई है। यहां शैव और वैष्णव संप्रदाय के साधु संत अब अलग-अलग हो गए हैं। साधु संतों के अलग होने का मुख्य कारण स्थानीय अखाड़ा परिषद भंग होना बताया जा रहा है। दरअसल शैव और वैष्णव संप्रदाय के साधु संतों का मुख्य संगठन अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद है लेकिन उज्जैन में स्थानीय अखाड़ा परिषद भी काम करती है । इस परिषद में दोनों ही संप्रदाय के संत पदाधिकारी है। रविवार को अचानक शैव संप्रदाय के संतों ने स्थानीय अखाड़ा परिषद से इस्तीफा दे दिया, इसके लिए वही दिन चुना गया जिस दिन मुख्यमंत्री के बेटे का सामुहिक विवाह का कार्यक्रम था।

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