इस बात में कोई शक नहीं है कि शिक्षक बच्चे के सामाजिक और भावनात्मक विकास की नींव भी रखते हैं। हालांकि देखा ये भी जाता है कि कई बच्चे अपने टीचर्स से बात करने में कतराते हैं या उनसे बेवजह डरते हैं। जब बच्चा क्लासरूम में डर महसूस करता है, तो उसकी सीखने की क्षमता और आत्मविश्वास पर गहरा असर पड़ता है।
साइकोलॉजी ऑफ ट्रस्ट इन क्लासरूम (Photo: iStock)
चाइल्ड साइकोलॉजी में इस कंडीशन को 'क्लासरूम की साइकोलॉजी ऑफ ट्रस्ट' (Psychology of Trust in Classroom) के ज़रिए समझा जा सकता है। आइए जानते हैं कि बच्चे शिक्षकों से क्यों डरते हैं और यह डर कैसे भरोसे में बदल सकता है।
बच्चे टीचर से डरते क्यों हैं?
सत्ता और अधिकार की असमानता: क्लासरूम में शिक्षक अथॉरिटी का प्रतीक होते हैं। जब यह अथॉरिटी सिर्फ नियम थोपने और सजा देने के लिए इस्तेमाल होती है, तो बच्चों के मन में सम्मान की जगह डर घर कर लेता है।
गलती होने का खौफ: कई बार बच्चे इसलिए सवाल नहीं पूछते क्योंकि उन्हें डर होता है कि गलत जवाब देने पर टीचर डांटेंगे या पूरी क्लास के सामने उनका मज़ाक बनेगा। सार्वजनिक शर्मिंदगी बच्चों के मन में सबसे गहरा डर पैदा करती है।
कम्युनिकेशन गैप : जब शिक्षक और छात्र के बीच केवल पढ़ाई और कड़े अनुशासन तक ही रिश्ता सीमित रहता है, तो बच्चा उन्हें अपनी समस्याएं बताने में असुरक्षित महसूस करता है।
पूर्वाग्रह और तुलना: बच्चों की आपस में तुलना करना ("तुम उससे कुछ सीखो") या किसी बच्चे को बार-बार निशाना बनाना, क्लास के माहौल को तनावपूर्ण बना देता है।
क्या कहती है 'साइकलॉजी ऑफ ट्र्स्ट'?
मनोविज्ञान के अनुसार, सफल शिक्षण की पहली शर्त सुरक्षा की भावना है। जब तक बच्चा क्लासरूम में शारीरिक और भावनात्मक रूप से सुरक्षित महसूस नहीं करेगा, उसका दिमाग नई जानकारी को स्वीकार करने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हो सकता।
ट्रस्ट या भरोसे की साइकोलॉजी तीन मुख्य स्तंभों पर टिकी है:
सहानुभूति: शिक्षक जब यह समझते हैं कि हर बच्चे के सीखने की गति अलग होती है और गलतियां करना सीखने का ही एक हिस्सा है, तब बच्चों का डर खत्म होने लगता है।
पूर्वानुमान लगाने योग्य व्यवहार: जब टीचर का मिजाज अचानक या अनपेक्षित रूप से बदलता (गुस्सा होना), तो बच्चे सहम जाते हैं। एक समान और शांत व्यवहार से बच्चों में सुरक्षा की भावना आती है।
सराहना और सम्मान: बच्चों की छोटी-छोटी कोशिशों की तारीफ करना और उनके विचारों को महत्व देना उनके अंदर यह भरोसा जगाता है कि 'टीचर मेरी परवाह करते हैं'।
डर को भरोसे में कैसे बदलें?
डर के माहौल में बच्चा केवल रटता है, सीखता नहीं। जब क्लासरूम में 'डर की जगह भरोसा' ले लेता है, तो बच्चा सवाल पूछने में झिझकता नहीं है, अपने विचार खुलकर रखता है और उसकी रचनात्मकता निखर कर बाहर आती है।
अध्यापकों को कड़े अनुशासन से आगे बढ़कर एक मेंटॉर और गाइड की भूमिका निभानी चाहिए। जब एक शिक्षक क्लासरूम में यह संदेश देता है कि "गलती करना गलत नहीं है, बल्कि न सीखना गलत है", तो वहीं से 'क्लासरूम ऑफ ट्रस्ट' की असली शुरुआत होती है।
