बुल्ले शाह से बॉलीवुड तक, जब इबादत पर चढ़ा इश्क का रंग, जानिए सूफी गीतों में कौन है रंगरेज

सूफी संतों ने हमेशा से ईश्वर तक पहुंचने का सबसे सुंदर रास्ता प्रेम को माना है। उनके लिए ईश्वर एक प्रियतम है, जिससे मिलन ही उनकी आत्मा का उद्देश्य है। ईश्वर से मिलने के लिए हमें अपनी आत्मा को शुद्ध करना पड़ता है। उसे अहंकार, द्वेष और सांसारिक मोह से मुक्त करना पड़ता है। सूफी दर्शन में रंगरेज यही काम करता है।

शायद ही कोई ऐसा हो जिसने सूफी गीत ना सुने हों। सूफी गीतों का जादू ही कुछ ऐसा है कि जब भी इसके स्वर फूटते हैं वो दिल के साथ ही रूह को भी छू लेते हैं। सूफी गीतों की सबसे बड़ी खासियत ये है कि इन गीतों में शब्द, भाव और राग एक ऐसी तस्वीर उकेरते हैं जो इश्क, इबादत और रूहानी जिरह का संगम बन जाते हैं। एक शब्द है जो बहुत से सूफी गीतों में कई बार बड़ी खूबसूरती से इस्तेमाल होता रहा है। सूफी गीतों में पूरी बुलंदी से गूंजने वाला यह शब्द है 'रंगरेज'। सूफी गायकों ने रंगरेज को आत्मा को परमात्मा के रंग में रंगने वाला प्रतीक बना दिया है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह रंगरेज होता क्या है और सूफी गीतों की जान कैसे है यह शब्द?

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सूफी गीतों में क्या होता है रंगरेज? (Photo: iStock)

रंगरेज में बसती है सूफी गीतों की रूह (Photo: iStock)

क्या होता है रंगरेज?

सूफी गीतों में इश्क और इबादत को एक अनूठे अंदाज में जोड़ने वाले इस रंगरेज शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है रंग करने वाला। रंगरेज फारसी भाषा का शब्द है। भारत में रंगरेज एक समुदाय है जो कपड़ों को रंगने का काम करता है। लेकिन सूफी साहित्य और गीतों में रंगरेज का मतलब बहुत ज्यादा गहरा है। रंगरेज ईश्वर है और आत्मा उस कपड़े की तरह, जिसे वह अपने प्रेम के रंग में डुबोता है। सूफी दर्शन में रंगरेज वह है जो आत्मा को प्रेम और भक्ति के रंग में रंग देता है। यह परमात्मा का प्रतीक है, जो इंसान के मन को अपने दैवीय प्रेम से सराबोर करता है। जैसे प्रेम अगर सच्चा हो तो वह व्यक्ति को बदल देता है। ठीक वैसे ही जैसे रंगरेज कपड़े की पहचान बदल देता है।

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