जुगनी- ये शब्द सुनते ही सूफियाना सरगम से लैस एक अजीब सी मिठास मन के भीतर उतरने लगती है। इस शब्द में ऐसा जादू है कि यह सुनने वाले को पूरी तरह से अपनी जद में ले लेती है। जुगनी दशकों से पंजाब लोकगीतों की आत्मा है। पंजाबी लोकगीतों में जुगनी ऐसा लोक-प्रतीक है जो कभी दुल्हन बनकर गीतों में उतरती है तो कभी रूह की आवाज बनकर सूफी फकीरों की जुबान पर चढ़ जाती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर ये जुगनी है क्या? पंजाब की गायकी में क्यों लहू बनकर दौड़ रही है जुगनी? जुगनी का ऐसा क्या मोह जिसे अलम लोहार से गुरदास मान और दिलजीत दोसांझ तक नहीं छोड़ पाए?
पंजाबी लोकगीतों में क्या है जुगनी का मतलब? (Photo Source: You Tube)
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जुगनी क्या है? (What is Jugni)
जुगनी के कई मतलब हैं। रात के अंधेरे में अपनी रोशनी बिखेरने वाली मादा जुगनू को जुगनी कहा जाता है। जुगनी एक तरह का गले में पहनने वाला पारंपरकि गहना भी है। लेकिन पंजाबी और सूफी गायकी की जुगनी कुछ और है। ऐसा माना जाता है कि जुगनी शब्द बना है जग से, हालांकि इसपर गहरे मतभेद हैं। पंजाब के लोकगायकों ने जुगनी को इंसानी चोला पहनाकर एक ऐसी लड़की के तौर पर पेश किया जो दुनिया को अपनी आंखों से देखती है, समझती है और उस पर अपनी बात कहती है। वह एक तटस्थ, निरीक्षक रूह की तरह जगह जगह जाती है..कभी शहरों की गलियों में, कभी मजारों पर, कभी युद्ध के मैदानों में तो कभी प्रेमियों के दिलों में। जुगनी को प्रतीक बनाकर अलग-अलग गायकों ने अपनी गायकी में अलग तरह से इस्तेमाल किया है।
'जुबली' से बनी जुगनी!
पंजाबी संगीत के जानकारों का मानना है कि जुगनी शब्द की शुरुआत 1906 में अमृतसर के पास के गांव मंजा हुई थी। इस गांव के दो अनपढ़ लेकिन बेहद प्रतिभाशाली गायक भाइयों बिश्ना और मांडा ने सबसे पहले अपने गीत में जुगनी का इस्तेमाल किया। दोनों घुमंतू कलाकार थे। गांव-गांव घूमकर लोकगीत सुनाते थे। उनकी शैली में बगावत की खनक के साथ ही जुबान में वो ताकत थी जो सुनने वालों के दिलों को छू जाती थी।
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo: AI IMage)
उस दौर में क्वीन विक्टोरिया के शासन की 50वीं सालगिरह पर ब्रिटिश सरकार ने हिंदुस्तान के हर जिले में जुबली मसाल जुलूस निकालने का तय किया। अमृतसर में भी वह मसाल पहुंची। उन दिनों पंजाब के लोगों के दिलों में अंग्रेजी हुकूमत के लिए गुस्सा पनप रहा था। इसी माहौल में बिश्ना और मांझा ने मसाल जुलूस के साथ चलते हुए गीत गाए, जिनमें जनता की पीड़ा और सत्ता के प्रति गहरा विरोध था। लोग बताते हैं कि यहीं पहली बार ‘जुगनी’ शब्द सुनने को मिला, जो शायद ‘जुबली’ से बना था।
बिश्ना और मांडा का यह गीत लोकप्रिय होने लगा। सुनने के लिए लोगों की भीड़ जुटने लगी। ब्रिटिश सरकार ने इसे विद्रोह माना और दोनों को गिरफ्तार कर लिया। लेकिन तब तक पंजाब की मिट्टी में जुगनी का बीज बो दिया गया था। यही बीज समय के घूमते पहिए के साथ पंजाब के लोकगीतों की आत्मा बन गई।
पंजाबी लोकगीतों में जुगनी
पंजाबी लोकगीतों में जुगनी ऐसी लड़की के रूप में आती है जो गांवों की सड़कों पर घूमती है, त्योहारों में नाचती है, प्रेमी के इंतजार में तड़पती है और कभी-कभी समाज के ताने-बाने पर सवाल भी उठाती है। यह जुगनी अकसर साहस, स्वतंत्रता और नारी चेतना का रूप ले लेती है। जैसे कि जुगनी चली दरबार, ओ बाबा जी...गीत में जुगनी को सामाजिक संदर्भ में पेश किया गया है। इस गीत में जुगनी घूमती है, देखती है और जो महसूस करती है उसे गा देती है।
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जुगनी लोकगीतों की सीमा में बंधकर रहने वाली चीज नहीं थी। सूफियों ने जुगनी को लोकगीतों से उठाकर उसे आध्यात्मिकता का बसंती चोला पहनाया। जुगनी मजारों की चादरों से होकर रूह की गहराइयों में उतरी और ईश्वर की तलाश करने लगी। वह कभी अपने अंदर तो कभी अपने आसपास के समाज में उस रब को ढूंढ़ने लगी।
जुगनी को ईश्वर से जोड़ने वाला 'लोहार'
समय के साथ जुगनी ने कई रूप बदले। हालांकि इसकी असली उड़ान तब शुरू हुई जब मशहूर पंजाबी लोकगायक अलम लोहार ने 1930 में इसे अपनी आवाज में गाया। गीत था - जुगनी जुगनी कहंदे ने, दिल विच रब वसंदा ए...। यह पहली जुगनी थी जिसकी इलेक्ट्रानिक रिकॉर्डिंग हुई। रिकॉर्डिंग के जरिए अलम लोहार की जुगनी गांव की गलियों से निकलकर दूर-दराज तक पहुंची। लोहार के जुगनी की एक खास बात थी। वह जेंडर-न्यूट्रल थी। उनकी जुगनी केवल प्रेम या विद्रोह की कहानी नहीं थी, बल्कि ईश्वर की खोज और जीवन के अर्थ की रूहानी सफर भी थी।
अलम लोहार (Photo: Alam Lohar fan page/fb)
बाद में अलम लोहार के बेटे अरिफ लोहार ने कोक स्टूडियो में इसी जुगनी को नए अंदाज में गाया और उसे युवा दिलों की धड़कन बना दिया। इसके बाद रब्बी शेरगिल, गुरदास मान जैसे कई कलाकारों ने भी जुगनी को अपने-अपने अंदाज में अपनाया।
जुगनी के चार चेहरे
पंजाबी लोकगीतों के सागर में जब हम डूबते हैं तो पाते हैं कि जुगनी के आमतौर पर चार प्रमुख चेहरे हैं। वह कभी आध्यात्मिक जुगनी बन ईश्वर की खोज करती है तो कहीं प्रेमिका जुगनी बनकर अपने प्रेमी की राह तकती है। वह व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष की भाषा भी बनती है जब विदेशी मंचों पर गाई जाती है तो अपने देश की मिट्टी, भाषा और जड़ों से जुड़े रहने का प्रतीक बन जाती है:
1. आध्यात्मिक जुगनी:
जुगनी चली ऐ रब दे नाल,
सिर ते डाली ओ सच्च दी चाल।
चप्पा-चप्पा नूरां विच डोले,
जुगनी लब्धी मालामाल।
जुगनी वे सज्जण दी सखी,
ना ओ डरदी, ना ओ थकी।
इक ओ रब दी जोत समाई,
हर दिल विच ओ जुगनी जगी।
जुगनी वे ओ नूरां वाली,
कर लेवे मन दी रखवाली।
ना लोभ विच, ना मोह विच फसी,
बस नाम रब दा लेवे खाली।
जुगनी कहे – ‘मैं ओही हां’,
जो साच दी रह ते चली हां।
ना देह विच, ना रंग रूप,
बस रब दे नाल जुड़ी हां।
जुगनी जपदी राम राम,
ओदी चाल विच ओहला धाम।
ओदी बाणी विच वेदां दी गूंज,
ओदी सांस विच जप हरि नाम।
यहां जुगनी की आत्मा रूह और रब से जुड़ी है। यह सांसारिक मोह से दूर, सत्य और साधना की राह पर है। यहां जुगनी सूफी और संत परंपरा का प्रतिनिधित्व करती है जहां आत्मा खुद को रब में विलीन करने को आतुर है।
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2. विद्रोही जुगनी:
जुगनी चली सरकारां दे नाल,
बंदूकां विच भर लई सवाल।
ना झुकी सी, ना रुकी सी,
जुगनी बन गई बवाल।
जुगनी कहे सच दी बात,
ओ डरदी नहीं, ओ करदी घात।
जिथे वेखै लाचारी दा मंजर,
उठ जावे ओ थे विद्रोह दी बात।
ना डर वे जुगनी तानाशाहों से,
ना झुकदी पूंजी दे राज।
ओ लब्धी ए सच दी राह,
ते कर दी हर झूठी बात रद्द।
जुगनी बोल उठी मज़दूरां दी,
जुगनी बन गई गीत फकीरां दी।
सत्तावां दे सामने हो गई दीवानी,
बन गई ओ आग जुल्मी ज़ुबानी।
इस गीत में जुगनी सत्ता की आलोचक है। वह मजलूमों की आवाज, झूठ का पर्दाफाश और क्रांति की आग है। इस जुगनी में फकीरी, सच और संघर्ष का मेल है।
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3. प्रेमिका जुगनी:
जुगनी चली मेरे नाल नाल,
दिल विच लईया जाल-जाल।
सच्चे प्यार दी ओ प्यास सी,
रब वरगा एह हाल-हाल।
जुगनी वे तेरा रंग गुलाबी,
दिल विच बस गई तू शराबी।
तेरे नैनां दे तीर लग्गे,
बनी जुगनी मेरी लाजवाबी।
हाय ओ जुगनी, तू दिल दी रानी,
तेरे बिना लगे सूनी जवानी।
तैनू देख के चैन गवाया,
तैनू पाया तां रब नू पाया।
जुगनी यहां प्रेमिका है जो किसी की रूह तक पहुंच चुकी है। उसका रंग गुलाबी है यानि वह मोहब्बत की मूरत है। इस गीत में प्रेम का सूफियाना भाव है, जहां प्रेमी को प्रेम में ईश्वर मिल जाता है।
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4. प्रवासी जुगनी:
जुगनी चली परदेस पिया दे,
छड्ड आई गलियां लाहौर वालियां।
दिल विच साड़े मिट्टी दी खुशबू,
अखियां रोवे नी रातां दीआं।
जुगनी बोले हौले-हौले,
मैं तां रब दी खोज विच डोली।
इक हसरत देश दे दर्शन दी,
इक चाहे मां दी बोली।
पैरां हेट परदेस दी ठंडी रेत,
मन विच तड़पे पुरखां दी रीत।
हाथ विच पासपोर्ट, सीने विच पीर,
घर बुलावे हर इक चिट्ठी नवी-नवी।
जुगनी कहे – ना मैं विदेशी,
ना ही पूरी अपने देश दी।
इक पुल बनी मैं दो लोकां दी,
इक माटी विच, इक वीज़ा ले खड़ी।
फुर्सत दे पलां विच देखे सपना,
पीपल दे थल्ले बैठी मां दा चेहरा।
जुगनी दी सांसां विच लोरी लब्धी,
ते फोन दी रिंग विच ओहला सवेरा।
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इस गीत में जुगनी कोई आम लड़की नहीं है। वह दो दुनिया के बीच फंसी प्रवासी है। एक ओर मां की गोद, पीपल का पेड़ और देसी मिट्टी की याद तो दूसरी ओर परदेस का जीवन, जद्दोजहद और अनजाना अकेलापन।
पंजाब की लोकगयाकी में जुगनी ने हर किरदार को जिया। जुगनी की सबसे खास बात ये है कि वह कभी रुकती नहीं। जुगनी समय के साथ चलती है, समाज के साथ बदलती है लेकिन उसकी आत्मा एक जैसी रहती है..साफ, बेबाक, और सूफियाना।
पंजाब की जान क्यों है जुगनी
पंजाबी संस्कृति में जुगनी रूह की आवाज है। पुराने समय में जब गांव-घर में औरतों की आवाज दबा दी जाती थी तब जुगनी बनकर उनकी कहानियां, उनकी पीड़ा और उनका प्रेम लोकगीतों में दर्ज हो जाता था। जुगनी सिर्फ गाती नहीं थी, समाज को आइना भी दिखाती है। जुगनी प्रेम को रूहानी बनाती है और हर दिल में ईश्वर की लौ जलाती है। जैसे आरिफ लोहार गाते हैं- जुगनी ओ जुगनी, रब दी दीवानी...। इस एक लाइन में जुगनी की पूरी आत्मा समा जाती है। वह रब यानी ईश्वर की दीवानी है, लेकिन जमीन से जुड़ी हुई है। उसका प्रेम आध्यात्मिक भी है और सांसारिक भी।
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बॉलीवुड और जुगनी
समाज के नियमों को तोड़ते हुए अपने तरीके से जीने वाली बेबाक, बिंदास और आजाद जुगनी को बॉलीवुड ने बतौर नायिका अपनाया भी और खूब सराहा भी। ओए लकी लकी ओए, तनु वेड्स मनु, क्वीन और हाईवे जैसी फिल्मों में जुगनी के जरिए महिलाओं की आत्मनिर्भरता, विद्रोह और उड़ान की कहानियों को संगीत में पिरोकर परोसा गया। खासकर क्वीन फिल्म का जुगनी गीत इस परंपरा का नायाब उदाहरण है। यह गाना उस लड़की की कहानी है जो अकेले निकल पड़ी है..अपने डर, सीमाओं और सामाजिक उम्मीदों को पीछे छोड़ कर। तो वहीं हाईवे फिल्म की जुगनी हर उस रूह की आवाज है जो पिंजरा तोड़कर उड़ना चाहती है।
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पंजाब की मिट्टी से निकल बॉलीवुड, एल्बम्स और इंटरनेशनल कॉन्सर्ट्स तक का सफर तय करने वाली जुगनी अब ढोल की थाप के साथ डीजे बीट्स पर भी नाचती है। इस सफर में बहुत कुछ बदला, लेकिन जो नहीं बदला वो है जुगनी का सार – चेतना, साहस और सुंदरता।
