आज टीचर्स डे यानी शिक्षक दिवस है। लोग अपने शिक्षकों को याद करते हुए उनके प्रति कृतज्ञता जाहिर कर रहे हैं। दरअसल काल कोई भी रहा हो, इंसान को एक शिक्षक की जरूरत हमेशा रही है। हर दौर में शिक्षक समाज की सबसे बड़ी जरूरत रहे। कभी ये गुरु जी कहलाए, कभी मास्टर जी, कभी सर तो कभी फैकल्टी।
भारत में कैसे बदलता गया गुरु जी की स्वरूप (AI Image)
अब के टीचर तो कंटेंट क्रिएटर भी बन गए हैं। आज टीचर के हाथ में चॉक की जगह मार्कर है। क्लासरूम में ब्लैक बोर्ड की जगह स्मार्ट बोर्ड है और कई बार तो क्लासरूम की जरूरत भी नहीं पड़ रही। टीचर मोबाइल कैमरे के सामने खडा होकर हजारों, लाखों बच्चों को पढ़ा सकता है। एक ही पेशा, लेकिन भूमिका लगातार बदलती रही।
शिष्य के जीवन का हिस्सा होते थे गुरु
याद किजिए आज से करीब हजार साल पहले का हिंदुस्तान। तब गुरुकुल शिक्षा का केंद्र हुआ करते थे। बच्चे शिक्षा के लिए गुरु के पास जाते थे। गुरुकुल में शिष्यों को महज किताबी ज्ञान नहीं मिलता था। शिष्यों के लिए गुरु के साथ रहना, काम करना, अनुशासन सीखना और जीवन को समझना भी शिक्षा का हिस्सा था। गुरु शिष्य के जीवन का हिस्सा थे। हालांकि इन गुरुकुलों में हर किसी को प्रवेश नहीं मिलता था। वहां जाति और सामाजिक संरचना के हिसाब से ही बच्चों को शिष्य बनाया जाता था।
स्कूल खुले तो गुरु बन गए मास्टर जी
समय बदला। शिक्षा धीरे-धीरे गुरुकुल से निकलकर संस्थागत स्कूलों की तरफ बढने लगी। भारत में अलग-अलग इलाकों में पाठशालाएं, टोल, मदरसे और दूसरे स्थानीय शिक्षा केंद्र भी मौजूद थे। यानी शिक्षक का मॉडल एक जैसा नहीं था। अलग जगहों पर पढाने के अलग तरीके थे।
अंग्रेजों ने भारत में शिक्षा को पूरी तरह से बदल कर रख दिया। उनके आने के बाद स्कूल में एक तय पाठ्यक्रम आया। कक्षाएं बनीं। परीक्षाएं आईं। प्रमाणपत्र और अंक शिक्षा की सफलता मापने के महत्वपूर्ण तरीके बन गए।
NCERT के जर्नल में प्रकाशित एक स्टडी बताती है कि औपनिवेशिक दौर में शिक्षा व्यवस्था के साथ प्रमाणपत्र, परीक्षा और मार्कशीट की संस्कृति मजबूत हुई। अब शिक्षक के सामने सिर्फ यह जिम्मेदारी नहीं थी कि बच्चा ज्ञान हासिल करे। उसे परीक्षा भी पास करनी थी। यहीं से शिक्षक की भूमिका में बड़ा बदलाव शुरू हुआ। गुरु की जगह मास्टर साहब और बाद में सर जैसे संबोधन आम होते गए।
Sir का दौर और ब्लैकबोर्ड वाली क्लास
आजादी के बाद स्कूली शिक्षा का दायरा लगातार बढ़ा। शिक्षक अब गुरु से ज्यादा औपचारिक संस्थान का हिस्सा बन गया। अब टीचर के सामने दर्जनों बच्चे होते, उनका सिलेबस होता और तय समय पर परीक्षाएं होती। इस दौर में अच्छा टीचर वही माना जाता, जो विषय को अच्छी तरह समझाता हो, बच्चों को अनुशासन में रखता हो और परीक्षा में अच्छे नंबर दिलवा सके।
फिर आए कोचिंग टीचर
90 के दशक और उसके बाद भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं और कोचिंग का प्रभाव तेजी से बढ़ा। अब स्कूल के टीचर के साथ एक दूसरा टीचर भी सामने आया- कोचिंग टीचर। उसका फोकस अलग था। कम समय में ज्यादा सवाल। परीक्षा के पैटर्न की समझ, शॉर्टकट, ट्रिक्स, टाइम मैनेजमेंट और सबसे जरूरी- रिजल्ट।
धीरे-धीरे कुछ टीचर अपने विषय के साथ-साथ अपनी एक अलग पहचान बनाने लगे। कोचिंग सेंटर का टीचर सैकडों-हजारों बच्चों तक पहुंचने लगा। यहीं से शिक्षक का एक नया रूप सामने आया। टीचर अब ब्रांड बनने लगे।
टीवी से मोबाइल तक पहुंचे टीचर
फिर इंटरनेट आया और शिक्षक की दुनिया फिर बदल गई। पहले टीवी पर एजुकेशनल प्रोग्राम आते, फिर वेबसाइट और ऑनलाइन कोर्स आए, इसके बाद यूट्यूब ने तो पूरा खेल ही बदल दिया।
अब किसी छोटे शहर का टीचर भी कैमरा ऑन करके कह सकता था- आज हम इस सवाल को बहुत आसान तरीके से समझेंगे। इस टीचर के सामने बैठे बच्चे सिर्फ उसी शहर के नहीं होतो। वे देश के अलग-अलग हिस्सों से हो सकते थे। एक वीडियो कई हजार बच्चों तक पहुंच सकता था। टीचर पहली बार क्लासरूम की चार दीवारों से पूरी तरह बाहर निकल गया।
और देखते-देखते कंटेंट क्रिएटर बन गए टीचर
आज का डिजिटल टीचर सिर्फ सब्जेक्ट एक्सपर्ट नहीं है। उसे कैमरा समझना पड़ता है। वीडियो एडिटिंग सीखनी पड़ती है। थंबनेल के बारे में सोचना पड़ता है। सोशल मीडिया पर अपनी पहचान बनानी पड़ती है। कभी रील बनानी पड़ती है तो कभी लंबा लेक्चर। कभी लाइव क्लास। कभी पॉडकास्ट। यानी एक शिक्षक धीरे-धीरे टीचर से कंटेंट क्रिएटर भी बन रहा है।
यह बदलाव सिर्फ बाजार की वजह से नहीं आया। शिक्षा नीति भी तकनीक और डिजिटल संसाधनों की भूमिका को स्वीकार कर रही है। NEP 2020 में तकनीक के इस्तेमाल, डिजिटल पेडागॉजी और शिक्षकों के लगातार प्रोफेशनल डेवलपमेंट पर जोर दिया गया है।
बदलते समय और दौर के साथ टीचर सिर्फ सर नहीं रह गया। वह मेंटर हो चुका है, फैसिलिटेटर हो गया है, कंटेंट क्रिएटर बन गया है, टेक्नोलॉजी यूजर हो चुका है। इन सबसे आगे अब AI का दौर आ रहा है। शायद उस दौर में टीचर बच्चों को इंसान की तरह सोचना सिखाने वाला एक्सपर्ट की भूमिका अदा करे।
टीचर की भूमिका चाहे जितनी बाद बदले, इंसान के लिए उसकी जरूरत कभी नहीं बदल सकती। क्योंकि तकनीक हजारों सवाल के जवाब दे सकती है। कंटेंट जानकारी दे सकता है। लेकिन किसी बच्चे को यह समझाना कि किस सवाल का जवाब खोजना है, किस जवाब पर शक करना है और अपनी जिंदगी के लिए क्या चुनना है, यह काम आज भी एक अच्छे शिक्षक का ही है।
