भारत के प्रख्यात इतिहासकार प्रोफेसर सुमित सरकार का 13 अगस्त को 87 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उम्र संबंधी बीमारियों से ग्रसित सुमित सरकार ने दिल्ली स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली। उनकी पत्नी तनिका सरकार भी एक प्रसिद्ध इतिहासकार हैं और उनके बेटे आदित्य सरकार ब्रिटेन की वारविक यूनिवर्सिटी में इतिहास के एसोसिएट प्रोफेसर हैं।
प्रख्यात इतिहासकार सुमित सरकार का निधन (Photo: Manoj Jha/X)
1939 में प्रसिद्ध इतिहासकार सुशोभन सरकार के घर जन्मे सुमित सरकार ने प्रेसीडेंसी कॉलेज और कलकत्ता विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। बर्दवान विश्वविद्यालय में पढ़ाने के बाद, उन्होंने 1974 से 2004 तक दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर के रूप में अपना सबसे लंबा कार्यकाल पूरा किया और बाद में प्रोफेसर एमेरिटस रहे।
सुमित सरकार आधुनिक भारत, औपनिवेशिक शासन, राष्ट्रवाद और सामाजिक इतिहास के अग्रणी विद्वान थे। 1973 में प्रकाशित उनकी किताब 'द स्वदेशी मूवमेंट इन बंगाल' ने उन्हें इतिहास लेखन के शिखर पर पहुंचाया। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम को केवल बड़े नेताओं के भाषणों तक सीमित न मानकर उसमें किसानों, मजदूरों, छात्रों, महिलाओं और हाशिये के समूहों की भागीदारी पर विशेष जोर दिया।
सुमित सरकार को बहुत से लोग मार्क्सवादी इतिहासकार के रूप में जानेते थे। वह 'सबाल्टर्न स्टडीज कलेक्टिव' के संस्थापक सदस्यों में भी शामिल थे। हालाँकि, बाद में वैचारिक असहमतियों के कारण उन्होंने इस परियोजना से दूरी बना ली थी।
उन्हें 2003 में सरित चटर्जी स्मृति पुरस्कार और 2004 में 'रवींद्र पुरस्कार' से सम्मानित किया गया था। हालांकि, 2007 में पश्चिम बंगाल की तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार द्वारा किसानों के प्रति अपनाए गए रवैये के विरोध में उन्होंने रवींद्र पुरस्कार वापस लौटा दिया था।
सुमित सरकार का निधन भारतीय इतिहास लेखन और बौद्धिक जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा ने सुमित सरकार को गांधी की गहरी समझ रखने वाले इतिहासकार के रूप में याद किया। उन्होंने कहा कि सरकार गांधी को ऐसे व्यक्ति के रूप में देखते थे, जो हर किसी को एक जैसा सोचने के लिए मजबूर नहीं करते थे, बल्कि अलग-अलग विचार रखने वाले लोगों को साथ संघर्ष करने के लिए एक साझा ‘छतरी’ उपलब्ध कराते थे।
लेखिका नीलांजना रॉय ने उन्हें बहुलवाद में विश्वास रखने वाला और दृढ़ता से फासीवाद विरोधी इतिहासकार बताया। प्रकाशक अर्पिता दास ने भी उन्हें याद करते हुए बताया कि सुमित सरकार अपने एमए के छात्रों को अम्बर्टो इको की किताब The Name of the Rose पढ़ने की सलाह देते थे। उन्होंने उनके पढ़ाने के तरीके को याद करते हुए कहा कि वह छात्रों की बातों को ध्यान से समझते, सवालों के जवाब देते और उन्हें स्रोतों के आधार पर तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए प्रेरित करते थे। साथ ही वह इतिहास पढ़ते समय कल्पना को खत्म न करने की सलाह भी देते थे।
सुमित सरकार के निधन के साथ आधुनिक भारत के इतिहास को सामाजिक और जनपक्षीय नजरिए से देखने वाली एक महत्वपूर्ण आवाज खामोश हो गई है।
