रॉयल रसोई (Royal Rasoi): इतिहास गवाह है कि राजा-महाराजाओं और नवाब-सुल्तानों की शाही रसोई स्वाद के साथ ही उनकी समृद्धि, शक्ति और सांस्कृतिक वैभव का आईना भी होती थीं। इनमें सैकड़ों रसोइए, बावर्ची और खानसामे दिन-रात जुटे रहते थे। बावर्ची अपने बादशाह की शान में कोई कमी ना छोड़ते। ऐसा दस्तरखान सजाते कि सुल्तान का दिल बाग-बाग हो जाता।
बहुत से राजा महाराजा ऐसे भी हुए हैं जिनकी रसोई में बावर्चियों के साथ हकीमों की भी नियुक्ति होती थी। जहां बावर्ची अपने बादशाह के स्वाद का ध्यान रखते तो वहीं हकीम उनके स्वास्थ्य का। हकीम और बावर्चियों की जुगलबंदी से कई बार ऐसे व्यंजन तैयार होते जिनकी चर्चा दूर-दूर तक होती। अपनी खास सीरीज रॉयल रसोई के आज के अंक में हम ऐसी ही जुगलबंदी से निकले एक खास तरह के सूप से आपको रूबरू करवाएंगे जो सिर्फ हैदराबाद के निजाम के लिए बनती थी।
महफिलों के शौकीन महबूब
मीर महबूब अली पाशा हैदराबाद के छठे निजाम थे। उन्होंने 1869 से 1911 तक रियासत की जिम्मेदारी संभाली। इतिहास उन्हें हैदराबाद के सबसे रंगीन मिजाज निजाम के तौर पर भी याद करता है। महबूब अली पाशा को महफिल जमाने का बड़ा शौक था। उनकी हर शाम तवायफों के नाच गाने से गुलजार रहा करती थी।
निजाम मीर महबूब अली पाशा (Photo: The Nizams/fb)
1903 में छपे रिवायत-ए-दक्कन के मुताबिक शुक्रवार की शाम मीर महबूब अली पाशा के लिए बेहद खास हुआ करती थी। इस शाम भी बड़ी संख्या में तवायफें महफिल सजातीं, लेकिन माहौल कुछ खास रहता। निजाम पाशा इस खास महफिल का आगाज एक खास तरह का सूप पी कर करते। इस सूप को कहा जाता था दम-ए-कौस। ये काम निजाम पाशा के खास हकीम और बावर्ची ही करते।
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क्यों दम-ए-कौस के दीवाने थे निजाम
दम-ए-कौस को उस जमाने का लव टॉनिक माना जाता था। कहा जाता है कि ये पीने वाले के अंदर रोमांस को परवान चढ़ाता। शरीर में अजीब सी गर्मी आती और दिल-ओ-दिमाग में अजीब सी मदहोशी छाने लगती। कामेच्छा सवार होने लगती। मर्दाना ताकत कई गुना बढ़ जाती। कई इतिहासकारों ने इस 'जादुई' दम-ए-कौस का जिक्र किया है।
हकीम सैय्यद जिल-उर-रहमान अपनी किताब तिब-ए-यूनानी में लिखते हैं कि दम-ए-कौस ऐसा सूप था जो मर्द को शेर और दिल को आशिक बना देता। तवायफों की महफिल में कद्रदान जान फूंक देते। कुछ लोग इसे पीकर बिस्तर तलाशते तो कुछ गजल, शायरी या दास्तानगोई में लीन हो जाते।
शुक्रवार की महफिल बिना दम-ए-कौस के नहीं सजती थी।
दम-ए-कौस पीकर रातभर शेर पढ़ता रहा शायर
दम-ए-कौस से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा उन दिनों काफी मशहूर था। कहा जाता है कि दरबारी शायर शौकत रजा ने एक महफिल में जोश से भरी गजल सुनाने के बाद मुस्कराते हुए निजाम से कहा - जनाब, अगर मुझे भी दम-ए-कौस का एक प्याला मिल जाए, तो मेरी शायरी सुनकर तवायफें बेहोश हो जाएंगी।
शायर की इस हाजिरजवाबी पर निजाम ठहाका लगाकर हंस पड़े। उन्होंने तुरंत अपने निजी हकीम को बुलाया और शौकत रजा के लिए दम-ए-कौस का एक कटोरा मंगाने का आदेश दिया। कहा जाता है कि इसके बाद शायर पूरी रात महफिल में गजलें सुनाते रहे और उनके हर शेर पर तालियों और वाह-वाह का शोर बढ़ता रहा।
ब्रिटिश मेजर नहीं भूल पाया दम-ए-कौस का खुमार
दम-ए-कौस की चर्चा केवल निजामों के महलों तक सीमित नहीं रही। कहा जाता है कि ब्रिटिश अधिकारी भी इस शाही पेय के दीवाने थे। एक बार ब्रिटिश रेजिडेंट मेजर केवेंघ निजाम मीर महबूब अली पाशा की महफिल में शरीक हुए। महफिल में निजाम ने उनका स्वागत अपने खास दम-ए-कौस से किया। इस सूप को पीने के बाद जो हुआ उसे मेजर केवेंघ आजीवन नहीं भूल पाए।
उन्होंने साल 1878 में अपनी डायरी में इसका पूरा ब्योरा दिया है। उन्होंने लिखा- निजाम ने मुझे एक गाढ़ा पेय पीने को दिया। वो देखने में काफी लजीज लग रहा था। खुशबू भी कुछ अलग थी। मैंने पूरा एक प्याला पी लिया। पीने के करीब आधे-पौने घंटे बाद पूरे शरीर में अजीब सी हलचल महसूस होने लगी। शरीर में उत्तेजना और गर्मी बढ़ने लगी। दिमाग पर कामेच्छा सवार होने लगी। मैं उस शाम को कभी नहीं भूल सकता। मेजर केवेंघ की ये डायरी आज भी ब्रिटिश लाइब्रेरी में मौजूद है।
दम-ए-कौस की सामग्री जुटाने में महनों लग जाते थे।
क्या-क्या मिलाकर बनता था दम-ए-कौस?
दम-ए-कौस को तैयार करना बिल्कुल भी आसान नहीं था। इसके लिए दुर्लभ और खास सामग्रियों को जुटाने में कई महीने लग जाते थे। इसके बाद अनुभवी यूनानी हकीम, जिनमें हकीम अजमल खान और हकीम लुकमान अली जैसे नाम भी शामिल बताए जाते हैं, इस मिश्रण को 12 से 18 घंटे तक धीमी आंच पर पकाते थे।
इस शाही सूप में भेड़, हिरण या नीलगाय के जननांगों के अलावा अंबर, कस्तूरी, केसर और शिलाजीत जैसी चीजें मिलाई जाती थी। इसके साथ अखरोट, बादाम, खजूर और शहद जैसे पौष्टिक तत्व भी डाले जाते थे। स्वाद और सुगंध बढ़ाने के लिए गुलाब जल, इलायची, जायफल, दालचीनी और जावित्री का इस्तेमाल किया जाता था। इसके अलावा गिलोय और अर्जुन की छाल के अर्क भी इसमें मिलाए जाते थे।
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..और फिर दवा बन गई दम-ए-कौस
कोई भी दौर हमेशा एक सा नहीं रहता। समय बदलता है। हैदराबाद में भी वही हुआ। निजाम बदले। हिंदुस्तान बदला। राजशाही खत्म हुई। एक चीज जो चलती रही वो थी दम-ए-कौस। दम-ए-कौस आज भी हैदराबाद में मिल जाएगी। हालांकि अब ये दवा के तौर पर बिकती है।
हैदराबाद के बहुत से हकीम आज भी मर्दाना ताकत बढ़ाने के दावे के साथ दम-ए-कौस को बतौर दवा लोगों को बेच रहे हैं। हालांकि जिस तरह से महबूब अली पाशा के लिए उनकी शाही रसोई में दम-ए-कौस बनाया जाता उस तरह से बनाना लगभग नामुमकिन है। लेकिन कुछ तो बात इस शाही सूप में है ही कि करीब 200 साल बाद भी लोग इसके 'जादू' का जिक्र करते नहीं थकते।
