Royal Rasoi (रॉयल रसोई): रामपुर का नाम सुनते ही ज्यादातर लोगो के जेहन में रामपुरी चाकू या मिर्जा गालिब का नाम आ जाता है। कम लोगों को ही ये पता होगा कि उत्तर प्रदेश के इस शहर की एक और पहचान है, जो सदियों से स्वाद के शौकीनों को अपनी ओर खींचती रही है। यह पहचान है रामपुर के नवाबों की शाही रसोई की, जहां ऐसे-ऐसे व्यंजन तैयार होते थे, जिनकी खुशबू और स्वाद आज भी लोगों की जुबान पर बसे हुए हैं। रॉयल रसोई के आज के अंक में हम बात करेंगे रामपुर के नवाबों के शाही दस्तरखान की:
रामपुर की पाक परंपरा की शुरुआत 1774 से मानी जाती है, जब नवाब फैजुल्लाह खान ने इस रियासत की नींव रखी। उस दौर में रामपुर कला, संगीत, साहित्य और खान-पान का बड़ा केंद्र बन गया था। मुगल दरबारों, लखनऊ, कश्मीर और अफगान इलाकों से आए खानसामे यहां बस गए और उनकी पाक कला ने मिलकर एक ऐसी नायाब शैली को जन्म दिया, जिसे आज रामपुरी व्यंजन के नाम से जाना जाता है।
मिट्टी के बर्तनों में खड़े मसालों का जादू
रामपुरी व्यंजनों की सबसे बड़ी खासियत थी उनका पकाने का तरीका। यहां खाना मिट्टी के बर्तनों में धीमी आंच पर पकाया जाता था। टमाटर और लाल मिर्च के बजाय अदरक, प्याज, दालचीनी, जावित्री, जायफल, खस की जड़, और पीली मिर्च जैसे मसालों का इस्तेमाल ज्यादा होता था। चंदन का इस्तेमाल भी खाने में इस बारीकी से किया जाता कि किसी भी पकवान के स्वाद में अलग सी खुशबू भी आती थी।
रामपुर के नवाब हामिद अली खान (Photo: facebook)
तार कोरमा, जिसे नवाबों की पहचान माना जाता था
रामपुर के शाही दस्तरखान की शान था गोश्त तार कोरमा। इसे धीमी आंच पर घंटों पकाया जाता था। मज्जा और मसालों से तैयार इसकी ग्रेवी इतनी गाढ़ी और स्वादिष्ट होती थी कि इसे रामपुर के नवाबी खानपान की पहचान माना जाता था। यही नहीं, मुर्ग जहांगीरी जैसी डिशें भी शाही रसोई का हिस्सा थीं, जिन्हें बादाम और दही की ग्रेवी में तैयार किया जाता था।
कच्चे गोश्त की टिक्की, जिसका जवाब नहीं
रामपुर के नवाबों को कच्चे गोश्त की टिक्की बहुत पसंद थी। शाही रसोई में ये टिक्की लगभग रोज ही बना करती थी। बारीक कुटे हुए मटन से बनी यह टिक्की इतनी मुलायम होती है कि मुंह में जाते ही घुल जाती है। इसे अफगानी चपली कबाब का भारतीय रूप भी कहा जाता है। इसके अलावा दोहरा कबाब भी काफी लोकप्रिय था, जिसमें चिकन और मटन का अनोखा मेल देखने को मिलता है।
ऐसी बिरयानी, जो बाकी सबसे अलग थी
अगर बिरयानी की बात हो और रामपुर का जिक्र न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता। नवाबों के समय से ही रामपुर की मटन बिरयानी को देश की बेहतरीन बिरयानियों में गिना जाता रहा है। रामपुर के नवाब अपने लिए खास दूधिया बिरयानी भी बनावाते थे। इसमें चावल का रंग मोतियों जैसा बिल्कुल चमकीला सफेद हुआ करता था। इस बिरयानी में दूध का इस्तेमाल किया जाता था। आज भी रामपुर की ये दूधिया बिरयानी देशभर में पसंद की जाती है।
सब्जियों से बनता था मीठा
रामपुर के खानसामे सिर्फ मांसाहारी व्यंजनों के लिए ही मशहूर नहीं थे। उनकी रचनात्मकता मिठाइयों में भी दिखाई देती थी। सब्जियों से तैयार होने वाला 'सब्ज मीठा' और अदरक का हलवा उनकी अनूठे हुमर की बानगी थीं। रामपुर के पुराने लोग और खानसामे बताते हैं कि एक बार वहां के नवाब नवाब साहब की सेहत को दुरुस्त करने के लिए हकीमों ने अदरक खाने की सलाह दी। नवाब साहब अदर तो खा लेते लेकिन उन्हें इसका स्वाद पसंद नहीं था। तब शाही रसोइयों ने कई प्रयोगों के बाद अदरक का हलवा तैयार किया, जो नवाब को इतना पसंद आया कि वह शाही रसोई की खास मिठाई बन गया।
रामपुर से शुरु हुआ चांदी के वर्क का चलन
आज मिठाइयों और कबाबों पर लगने वाला चांदी का वर्क आम बात है, लेकिन माना जाता है कि इसका इस्तेमाल सबसे पहले रामपुर की शाही रसोई में शुरू हुआ था। इससे खाने की नमी और गर्माहट बनी रहती थी, साथ ही यह भी पता चल जाता था कि किसी ने खाने को छुआ तो नहीं।
रामपुर की पाक कला उत्तर भारते के सबसे अनोखे स्वाद का नमूना है
समय के साथ रामपुर की कई पारंपरिक पाक विधाएं गुम होती चली गईं। इसके पीछे बहुत से लोग कारण ये बाते हैं कि तब के खानसामे इन्हें अपने परिवार तक ही सीमित रखते थे। वैसे कुछ पुराने खानसामे और फूड हिस्टोरियन्स रामपुक के नवाबों की शाही रेसिपियों को फिर से जिंदा करने की कोशिश कर रहे हैं। पुराने फारसी और उर्दू दस्तावेजों के जरिए रामपुर की इस पाक विरासत को सहेजा जा रहा है।
रामपुर की शाही रसोई उस दौर की बानगी है, जब पकवान भी कला का हिस्सा माने जाते थे। यहां हर पकवान में स्वाद के साथ इतिहास, परंपरा और नवाबी ठाठ का ऐसा मेल था, जो आज भी खाने के शौकीनों को अपनी ओर खींच लेता है।
