Pandit Bhimsen Joshi: सिर पर सवार हुआ संगीत तो 11 की उम्र में छोड़ दिया घर, ग्रामोफोन की दुकान से जगी थी गाने की दीवानगी

Pandit Bhimsen Joshi Birth Anniversary: भारत रत्न से सम्मानित पंडित भीमसेन जोशी ने संगीत की दुनिया में तो एक से एक कीर्तिमान स्थापित किए, लेकिन 1985 में बने 'मिले सुर मेरा तु्म्हारा' की वजह से तो वो भारत के हर घर में पहचाने जाने लगे। ये वीडियो उनकी ही दिलकश आवाज से शुरु होता है। आज भी उनके सुरों का जादू संगीत की दुनिया तो सजाए हुए है।

Pandit Bhimsen Joshi Birth Anniversary: कभी-कभी इतिहास की सबसे बड़ी यात्राएं बहुत छोटी जगहों से शुरू होती हैं। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के महान गायक पंडित भीमसेन जोशी की कहानी भी एक साधारण ग्रामोफोन की दुकान से शुरू हुई थी। बचपन में स्कूल से लौटते समय उस दुकान के बाहर खड़े होकर रिकॉर्ड सुनना उनका रोज का रिवाज़ था। वहीं रुकना, सुनना और भीतर ही भीतर सुरों को दोहराना उनके जीवन की पहली अनौपचारिक तालीम साबित हुई। दुकान पर रखे ग्रामोफोन की उन धुनों ने एक बच्चे के भीतर यह भरोसा जगाया कि उसकी दुनिया संगीत में ही बसती है।

Bhimsen Joshi

मिले सुर मेरा तुम्हारा गा कर हिंदुस्तान के घर-घर तक पहुंच गए थे पंडित भीमसेन जोशी

विरासत में नहीं मिला संगीत

पंडित भीमसेन जोशी का जन्म 4 फरवरी 1922 को कर्नाटक के गड़ग जिले में हुआ था। वह परिवार में सबसे बड़े थे। घर का माहौल अनुशासन और पढ़ाई पर केंद्रित था। उनके पिता गुरुराज जोशी विद्वान व्यक्ति थे और कई भाषाओं के जानकार माने जाते थे। लेकिन परिवार में संगीत की कोई परंपरा नहीं थी। इसके बावजूद भीमसेन का झुकाव बचपन से ही सुरों की तरफ था। ग्रामोफोन और ट्रांजिस्टर की दुकानों के बाहर खड़े होकर वे रिकॉर्ड सुनते और फिर उन्हीं स्वरों को गुनगुनाने की कोशिश करते। वही दुकान उनके लिए पहली संगीत पाठशाला बन गई।

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