माटी की महक, घुंघरू की छनक और हाशिए का हुनर है बिहार का नटुआ नाच

पद्मश्री रामचंद्र मांझी ने कभी कहा था- ई नाच कभों मर न सकैला बाबू! ई हमार माटी के खून में बा। जब-जब बिहार के गांव में खुशी मनाई जाई, तब-तब ढोल पर नटुआ के घुंगरू बाजी।

Natua Dance: बिहार की मिट्टी में कुछ तो खास है कि जो एक बार इसके रंग में रंगता है फिर वो कभी बाहर निकल नहीं पाता। दरअसल बिहार की बात ही निराली है। यही ज्ञान की वह पावन भूमि है जहां नालंदा जैसा विश्वविख्यात विश्वविद्यालय था। आर्यभट्ट, चाणक्य और चंद्रगुप्त मौर्य इसी मिट्टी से निकले। यहीं बुद्ध को ज्ञान मिला तो भगवान महावीर का निर्वाण हुआ। गुरु गोबिंद सिंह जी भी यहीं जन्मे। बिहार भले आधुनिकता में पीछे रह गया हो लेकिन सांस्कृतिक तौर पर उससे समृद्ध राज्य शायद ही कोई हो। नटुआ नाच भी बिहार की इसी समृद्ध लोक परंपरा का अनूठा हिस्सा है।

Natua Nach

बिहार का मशहूर नटुआ नाच (AI Generated and Newsroom Verified Image)

कौन होते हैं नटुआ और कैसे होता है नटुआ नाच

नटुआ नाच बिहार के ग्रामीण अंचलों खासतौर पर मगध, भोजपुर, अंग और संथाल परगना से सटे इलाकों में खूब लोकप्रिय है। भाषाविद और लोक संस्कृति के शोधकर्ता डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय की किताब 'भोजपुरी लोक संस्कृति' के मुताबिक नटुआ नाच भारत के सबसे प्राचीन आदिम नृत्य रूपों में से एक है। यह मनोरंजन से बढ़कर शारीरिक शक्ति, भक्ति और उल्लास का ऐसा सम्मिश्रण है जहां नट बिना किसी लिखित पटकथा के अपनी शारीरिक लचक से कहानियां रचता है।

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