फैशन की दुनिया में पुरानी चीजों की वापसी कोई नई बात नहीं है। हालांकि कुछ वापसी अपने साथ एक पूरी कहानी लेकर आती हैं। मद्रास चेक्स भी ऐसा ही फैशन है। कभी दक्षिण भारत की गर्मी में पहनी जाने वाली हल्की-फुल्की कॉटन की पोशाकों और लुंगी से जुड़ा यह चेक पैटर्न आज फिर फैशन की दुनिया में दिखाई दे रहा है। शर्ट, स्कर्ट, ड्रेस, को-ऑर्ड सेट और यहां तक कि डिजाइनर कलेक्शन में भी इसे नए अंदाज में पेश किया जा रहा है। मद्रास चेक्स की कहानी के पीछे भारत के टेक्सटाइल इतिहास, बुनकरों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की लंबी कहानी छिपी है।
फिर से फैशन में लौटा मद्रास चेक (Photo: Pinterest)
आखिर क्या है मद्रास चेक?
मद्रास चेक हल्का कॉटन फैब्रिक है, जिसमें अलग-अलग रंगों की धारियां एक-दूसरे को काटती हुई चेक पैटर्न बनाती हैं। इसका नाम पुराने शहर मद्रास यानी आज के चेन्नई से जुड़ा है।
पारंपरिक मद्रास चेक हाथ से बुना जाता था। इसमें रंगीन धागों का इस्तेमाल होता था और पुराने कपड़ों में रंगों का थोड़ा-बहुत फैलना भी इसकी खासियत थी। यही वजह है कि पुराने मद्रास चेक के हर कपड़े का पैटर्न बिल्कुल एक जैसा नहीं होता था। यानी जो चीज आज डिजाइन की तरह दिखाई देती है, उसमें कभी हाथ से बुनाई की अपनी छोटी-छोटी अनियमितताएं भी खूबसूरती का हिस्सा थीं।
कहानी सिर्फ चेन्नई की नहीं, पूरी दुनिया की है
मद्रास चेक्स की जड़ें 17वीं सदी के दक्षिण भारतीय कॉटन बुनाई केंद्रों से जुड़ी हैं। कोरोमंडल तट से तैयार होने वाले रंगीन कॉटन कपड़े समुद्री व्यापार के रास्ते यूरोप, अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और बाद में अमेरिका तक पहुंचे। यहीं से यह कपड़ा स्थानीय पहनावे से निकलकर ग्लोबल टेक्सटाइल बन गया।
अफ्रीका में भी मद्रास फैब्रिक ने अलग पहचान बनाई। दक्षिण-पूर्व एशिया और कैरेबियन में इसका इस्तेमाल स्थानीय पहनावे में हुआ। अमेरिका में पहुंचने के बाद यह एक अलग तरह की फैशन पहचान से जुड़ गया।
कभी इसकी सबसे बड़ी खूबी था इसका रंग
पुराने मद्रास चेक की एक दिलचस्प खासियत थी उसका रंग। प्राकृतिक रंगों से रंगे धागों के कारण कपड़ा धोने पर रंग एक-दूसरे में थोड़ा फैल जाते थे। इसे आज की नजर से देखें तो यह किसी फैब्रिक की कमी लग सकती है। लेकिन बाद में यही खूबी इसकी पहचान बन गई।
अमेरिका में इसे “ब्लीडिंग मद्रास” के नाम से भी पहचान मिली। यानी ऐसा मद्रास कपड़ा जिसके रंग धुलने पर धीरे-धीरे एक-दूसरे में मिलते जाते थे। फैशन की दुनिया ने इस कमी को ही स्टाइल बना दिया।
फिर क्यों लौटा मद्रास चेक?
आज फैशन में एक बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है। लोग सिर्फ नया दिखने वाला कपड़ा नहीं चाहते। हेरिटेज, क्राफ्ट और नेचुरल फैब्रिक में भी दिलचस्पी बढ़ी है। मद्रास चेक इस ट्रेंड में बिल्कुल फिट बैठता है। यह हल्का है। हवा को पास होने देता है। गर्म मौसम में आरामदायक है। और इसके रंग किसी भी आउटफिट को तुरंत जीवंत बना देते हैं।
यही वजह है कि आज इसे सिर्फ गर्मियों की पुरानी शर्ट के रूप में नहीं देखा जा रहा। डिजाइनर इसे मॉडर्न सिल्हूट के साथ जोड़ रहे हैं। स्कर्ट, जैकेट, ड्रेस और को-ऑर्ड सेट में इसका इस्तेमाल हो रहा है।
लुंगी से लक्जरी फैशन तक
मद्रास चेक की सबसे दिलचस्प बात शायद यही है कि इसका रिश्ता किसी एलीट फैशन हाउस से नहीं, रोजमर्रा के भारतीय पहनावे से रहा है। दक्षिण भारत में इसी तरह के चेक कपड़े लुंगी जैसे पारंपरिक परिधानों में इस्तेमाल होते रहे हैं। अब वही विजुअल कोड डिजाइनर फैशन में नए कट और नए सिल्हूट के साथ दिखाई दे रहा है।
इस बार वापसी सिर्फ ट्रेंड की नहीं
मद्रास चेक्स की वापसी हमें फैशन का एक दिलचस्प बदलाव भी दिखाती है। लंबे समय तक आधुनिक फैशन का मतलब पश्चिमी, मिनिमल और बिल्कुल नया दिखना माना गया। अब कहानी कुछ बदल रही है। पुराने कपड़े, क्षेत्रीय बुनाई, हाथ का काम, प्राकृतिक फैब्रिक और स्थानीय पहचान-
ये चीजें फिर से फैशन का हिस्सा बन रही हैं। इंडियन टेक्सटाइल प्रिंट्स की दूसरी परंपराएं भी इसी तरह नए सिल्हूट के साथ वापस आ रही हैं।
मद्रास चेक इसलिए खास है क्योंकि यह सिर्फ एक पैटर्न नहीं है। इसके धागों में दक्षिण भारत की गर्मी है। बुनकरों की मेहनत है। समुद्री व्यापार का इतिहास है। और अब उसी पुराने कपड़े में आज की फैशन दुनिया अपना नया स्टाइल तलाश रही है। शायद यही किसी असली क्लासिक की पहचान है। वह पुराना होकर भी कभी आउटडेटेड नहीं होता।
