किताब कैफे: धर्मवीर भारती ने महाभारत के युद्ध में बची राख की स्याही से रचा था 'अंधा युग'

Times Now Navbharat Kitaab Cafe: अंधा युग वहां से आकार लेती है जब कुरुक्षेत्र में सिर्फ लाशें पड़ी हैं। धर्मवीर भारती ने अंधा युग के जरिए बताया है कि युद्ध में कोई जीतता नहीं, सिर्फ इंसानियत हारती है।

Times Now Navbharat Kitaab Cafe: हम साहित्य में रूचि रखने वाले अपने पाठकों के लिए किताब कैफे नाम से एक सीरीज लेकर आए हैं। इस सीरीज में आपको हिंदी और अंग्रेजी समेत तमाम भाषाओं की कालजयी रचनाओं से आपको रूबरू करवाएंगे। इसी कड़ी में आज हम आपको धर्मवीर भारती की मशहूर कृति अंधा युग की सैर पर ले जाएंगे।

Kitaab Cafe Andha Yug

किताब कैफे: अंधा युग

संगम नगरी प्रयागराज में जन्मे धर्मवीर भारती ने जब अपनी स्याही से प्रेम को लिखा तो गुनाहों का देवता जैसा उपन्यास हमें मिला। वही भारती जब नाटक की दुनिया में कदम रखते हैं तो महाभारत जैसे महाकाव्य को छूते हैं। वह महाभारत के 18वें दिन यानी कि अंतिम दिन की कहानी को अपनी कलम से सजाते हैं और दुनिया को देते हैं अंधा युग। अंधा युग महाभारत के भीषण युद्ध के बाद बचे राख की कहानी है। यह उस अंधे समय की कथा है जिसमें हम आज भी जी रहे हैं।

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