Kargil Vijay Diwas: कारगिल के शहीदों के वो अधूरे खत, जो उनकी शहादत के बाद ही पढ़े जा सके

कुछ चिठ्ठियां ऐसी भी थीं जो कभी पोस्ट ही नहीं हो सकीं। सैनिकों के बैग, जैकेट या जेब से मिलीं। वो अधूरे खत थे। किसी खत पर स्याही फैल गई थी, तो किसी पर लिखने वाले के खून के धब्बे।

महीना था मई जून का और साल 1999। पड़ोसी मुल्क से आए दुश्मनों की आंखों में आंखे डाल भारतीय सैनिक उनकी इस हिमाकत का मुंहतोड़ जवाब दे रहे थे। कारगिल की बर्फीली चोटियों पर बिना रुके गोले-बारूद चल रहे थे। बम-बंदूक की उन्हीं तेज आवाजों के बीच कुछ सैनिकों की कलम भी चल रही थी। उन कलमों से लिखे जा रहे थे ऐसे खत, जिनमें जंग की हाहाकार नहीं, घर की याद थी। उनमें दुश्मन का जिक्र कम और मां के हाथ के खाने, पत्नी के प्यार, बाप की उम्मीद और बच्चों के भविष्य की चिंता ज्यादा थी।

Kargil Vijay Daiwas 2026

कारगिल विजय दिवस 2026

जंग कैसी भी हो। उसके इतिहास में जीत और हार तो दर्ज होती है, लेकिन उन चिठ्ठियों को हम भूल जाते हैं, जिन्हें सैनिकों ने आखिरी बार लिखा था। लेकिन कारगिल युद्ध के बाद ऐसा नहीं हुआ। उन खतों की स्याही लोगों को रुला गई। जंग के मैदान से हमारे जवानों के लिखे कुछ खत अपने घर तक पहुंच गए तो कुछ डाक की थैलियों में ही रह गए। कुछ चिट्ठियां सैनिकों के सामान के साथ तब मिलीं, जब उनके शव तिरंगे में लिपटकर अपने गांव-घर लौटे। ये खत कागज के वो टुकड़े बने जिसने बताया कि जंग के मैदान में खड़ा सैनिक एक देश का सिपाही होने के साथ ही किसी का बेटा, पति, पिता और भाई भी होता है।

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