काका हाथरसी: हिंदी साहित्य का वो फनकार जिसने अपने नाम को बना दिया हास्य का पर्याय

18 सितंबर 1995 को, यानी अपने 89वें जन्मदिन के दिन ही उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा। जिस तारीख को वे इस दुनिया में आए थे, उसी तारीख को चले भी गए।

Kaka Hathrasi: एक जमाना था जब कवि सम्मेलनों की अलग ही रंगत हुआ करती थी। मंच पर कवि आते, अपने खास अंदाज में कविताएं सुनाते और श्रोता तालियां बजाकर दाद देते। वहीं, अगर उस मंच पर काका हाथरसी पहुंच जाते, तो पूरे माहौल में एक अलग ही जान आ जाती। काका का अंदाज़ इतना घरेलू होता था मानो पड़ोस के कोई चाचा या ताऊ सामने बैठकर बतिया रहे हों। जैसे ही वे कविता पढ़ना शुरू करते, ठहाकों के साथ-साथ समाज की कई कड़वी सच्चाइयां भी परत-दर-परत सामने आने लगती थीं।

Kaka Hathrasi

हास्य की दुनिया का सबसे बड़ा नाम कैसे बने काका हाथरसी (Photo: AI Generated and News room verified )

आने और जाने की एक ही तारीख

18 सितंबर 1906 को उत्तर प्रदेश के हाथरस में जन्मे काका हाथरसी का असली नाम प्रभुलाल शिवलाल गर्ग था। हालांकि साहित्य और मंच की दुनिया में वे अपने उपनाम 'काका हाथरसी' से इतने मशहूर हुए कि उनका असली नाम पीछे छूट गया। दिलचस्प बात यह है कि 18 सितंबर 1995 को, यानी अपने 89वें जन्मदिन के दिन ही उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा। जिस तारीख को वे इस दुनिया में आए थे, उसी तारीख को चले भी गए।

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