Shayari on War, Jung Shayari in Hindi: जंग ऐसा शब्द है जिससे हर कोई वाकिफ है। जंग सिर्फ दुश्मन से नहीं लड़ी जाती। इंसान कई मोर्चों पर जंग लड़ता है। ये जंग कभी जिंदगी से होती है तो कभी हालात से। कभी अपनों से होती है तो कभी खुद से जंग लड़नी पड़ती है। कई बार हम सबकुछ हार कर भी जंग जीत जाते हैं तो कई बार जंग जीतने के लिए सबकुछ हार जाते हैं। जंग सिर्फ शब्द नहीं बल्कि एक एहसास है। इस एहसास को बहुत से शायरों ने अपनी स्याही के रंग से सजाया है। दरअसल देश दुनिया के तमाम शायरों ने जंग पर कई बेहतरीन शेर लिखे हैं। आइए डालते हैं जंग पर लिखे 56 चुनिंदा शायरी पर एक नजर:
जंग पर शायरी (Shayari on War)
Jung Shayari attitude | Shayari on Jung
1. अकेला लड़ रहा हूं ज़िंदगी की जंग बचपन से
बला की भीड़ है कोई नहीं अपना नज़र आया
- मुकेश इंदौरी
2. उस ज़ुल्म का क़िस्सा लम्बा है उस जंग की पुस्तक भारी है
वो जंग जो कब की ख़त्म हुई वो जंग अभी तक जारी है
- सईद अहमद अख़्तर
3. ऊस परी-रू सीं और हातिम सीं
रात दिन सुल्ह ओ जंग है यारो
- शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
4. एक तरफ़ कुछ होंट मोहब्बत की रौशन आयात पढ़ें
इक सफ़ में हथियार सजाए सारे जंग-परस्त रहें
- अहमद जहाँगीर
5. अजीब उस से तअल्लुक़ है क्या कहा जाए
कुछ ऐसी सुल्ह नहीं है कुछ ऐसी जंग नहीं
- अकबर अली खान अर्शी जादह
6. कहते हैं लोग देख के इस हाल में मुझे
अपने ख़िलाफ़ जंग तो लड़ता नहीं कोई
- रूही कंजाही
7. कहराता सूरज ये कह कर डूब जाता है ।
वो जंग जीती हुई थी जो मैंने हारी है ।
- ताहिर फ़राज़
8. अज़ीम क़िला-दार सब असीर कर लिए गए
जो जंग-जू थे ना-तवाँ हवा उड़ा के ले गई
- सरफ़राज़ ख़ान आज़मी
9. अना का नाज़ लबादा उतार कर देखो
किसी के वास्ते ये जंग हार कर देखो
- नाज़ मुजफ़्फ़राबादी
10. अना की जंग ने बर्बाद कर दिए रिश्ते
अगरचे इश्क़ है तो सर झुका लिया जाए
- मुसव्विर फ़िरोज़पुरी
11. अना ही दोस्त अना ही हरीफ़ है मेरी
इसी से जंग इसी को सिपर भी करना है
- अरशद अब्दुल हमीद
12. अपनी जंग ही लड़ती है
लाख कहो वो बाग़ी है
- बिल्क़ीस ख़ान
13. अपनी सुल्ह-ए-दोस्ती लाई ये रंग
वो मुसलसल जंग में रहने लगा
- इस्लाम उज़्मा
14. अपनी ही आरज़ूओं से इक जंग है हयात
बस यूँ समझ लो दस्त-ए-तह-ए-संग है हयात
- शायर जमाली
15. अपने बल पे लड़ती है अपनी जंग हर पीढ़ी
नाम से बुजुर्गों के अज्मतें नहीं मिलतीं
- मंज़र भोपाली
16. अपने मफ़ाद के लिए मैदान-ए-जंग में
जीता गया कभी कभी हारा गया मुझे
- नबील अहमद नबील
17. अपने शजरे को भी हमराह लिए चल रस्मन
जंग से क़ब्ल यहाँ नाम-ओ-नसब पूछते हैं
- महमूद आमिर
18. अपनो की साज़िशों से ही मसरूफ़-ए-जंग हूँ
ग़ैरों से दुश्मनी की ज़रूरत नहीं मुझे
- सय्यद मोहम्मद असकरी आरिफ़
19. अपनों से जंग है तो भले हार जाऊँ मैं
लेकिन मैं अपने साथ सिपाही न लाऊँगा
- अख़तर शाहजहाँपुरी
20. अब अँधेरों से जंग की ख़ातिर
कुछ चराग़ों को बो रही है शब
- सलीम रज़ा रीवा
21. अब इस जहाँ में रहना भी मुमकिन नहीं रहा
आख़िर को ये भी जंग का मैदान बन गया
- सईद नज़र
22. अब के बचा सकी न मिरी ख़ामुशी मुझे
इस बार मेरी जंग किसी हम-नवा से थी
- कुलदीप कुमार
23. अब जंग हर किसी से तो मत छेड़ गर ये लोग
देने को अपनी जाँ तुझे तैयार हो गए
- महेश जानिब
24. अब तो इस जंग का फ़ैसला हो कोई
लड़ रहे हैं अज़ल से हवा और मैं
- इफ़्तिख़ार मुग़ल
25. अब निशाना उस की अपनी ज़ात है
लड़ रहा है इक अनोखी जंग वो
- अब्दुस्समद ’तपिश’
26. अब मेरी अपने आख़िरी दुश्मन से जंग है
मैदाँ में कोई मेरे सिवा अब नहीं रहा
- मिद्हत-उल-अख़्तर
27. अब यही जंग का उन्वान भी हो सकता है
उस ने पत्थर कोई फेंका है ख़बर की सूरत
- ज़िया फ़ारूक़ी
28. अबरू से गो लड़ा कभी तीर-ए-निगाह से
दिल को है मेरे जंग ये ऐ जंग-जू पसंद
- नवाब उमराव बहादूर दिलेर
29. अभी जीते हैं अहरमन-ज़ादे
अभी बरपा है ख़ैर-ओ-शर की जंग
- बदर जमाली
30. अभी तो जंग जारी है
मगर आ'साब ढीले हैं
- फ़रहत अब्बास शाह
31. अभी मैं फ़ाक़ा-कशी के महाज़-ए-जंग पे हूँ
मिरी ग़ज़ल से कहो मेरा इंतिज़ार करे
- सग़ीर रियाज़
32. अमन पसंद इन्सान इधर भी है और उधर भी है,
मगर जो शोलो को हवा दे वो इधर भी है और उधर भी है
- डॉ. महेन्द्र भास्कर
33. अम्न की कर ख़ैरात अता मेरे मौला
जंग-ओ-जदल को दूर हटा मेरे मौला
- साहिल मुनीर
34. अम्न की ख़ातिर इतना ही कर सकता था
मैं ने जंग में अपने बेटे भेजे हैं
- इकराम बसरा
35. अम्न-ए-आलम की ख़ातिर
जंग युगों से जारी है
- असलम हबीब
36. अल्लाह अल्लाह सियासत-ए-हाज़िर
सुल्ह के साथ साथ जंग भी है
- ऐन सलाम
37. अहद-ए-सितारा जंग है मंज़र-याबी पर
दिल दिल 'रहमानी' वहशत-सामानी है
- परवेज़ रहमानी
38. अहबाब हैं क्यूँ दंग मुझे ही नहीं मालूम
किस से है मिरी जंग मुझे ही नहीं मा'लूम
- राहत हसन
39. आ अंदलीब सुल्ह करें जंग हो चुकी
ले ऐ ज़बाँ-दराज़ तू सब कुछ सिवाए गुल
- मीर तक़ी मीर
40. आ गया दस्ता अबाबीलों का अहमद-इरफ़ान
अब हमें जंग में पस्पाई नहीं हो सकती
- अहमद इरफ़ान
41. आँख में अफ़्वाज ख़्वाबों की उतारें मुस्तक़िल
और ता'बीरें उठाएँ ज़िंदगी की जंग से
- ज़किया शैख़ मीना
42. आँखें लड़ा रहे हो सर-ए-बज़्म ग़ैर से
और मुझ से ये बयान कि हम जंग-जू नहीं
- रशीद लखनवी
43. आँखें लड़ीं तुझ से मैं हुआ क़त्ल
इन तुर्कों ने जंग-ए-ज़रगरी की
- रिन्द लखनवी
44. आँखों को तेरी दीद मयस्सर नहीं मगर
दिल जंग कर रहा है रसद के बग़ैर भी
- सरदार अयाग़
45. आइए करते हैं बे-जंग-ओ-जदल
बाहमी रस्सा-कशी पर ग़ौर-ओ-ख़ौज़
- मसूद हस्सास
46. आख़िरी जंग मैं लड़ने के लिए निकला हूँ
फिर रहे या न रहे तेरा दिवाना आना
- मुबारक सिद्दीक़ी
47. आख़िरी हिचकी लेगा कौन
मेरी जंग लड़ेगा कौन
- राहिल बुख़ारी
48. आग पानी में अगर जंग हुई
किस तरफ़ आदमी होगा देखें
- राम रियाज़
49. आज तलवार हुई जाती हैं शाख़ें उस की
जंग होनी है हवाओं से शजर जान गया
- फ़ारूक़ अंजुम
50. आज भी जंग के बादल हैं जहाँ पर छाए
अहद-नामों से अयाँ अम्न की तहरीर न देख
- नरेश नदीम
51. इंसान अपनी जंग का ख़ुद फ़ैसला करें
ख़ुशनूदी चाहता हूँ ख़ुदा की मदद नहीं
- हम्ज़ा याक़ूब
52. मुझ से इक जंग जीतनी थी उसे
सो लगी मेरी हार की क़ीमत
- विवेक बिजनौरी
53. मुझ से भी बरसर-ए-पैकार है क़िस्मत मेरी
देखना जंग का नक़्शा है तो आ देख मुझे
- ज़ाहिदा ख़ातून शरवानिया
54. मुद्दत से फिर रहा हूँ ख़ुद अपनी तलाश में
हर लम्हा लड़ रहा हूँ ख़ुद अपने ख़िलाफ़ जंग
- बशर नवाज़
55. मुल्ला बना दिया है इसे भी महाज़-ए-जंग
इक सुल्ह का पयाम थी उर्दू ज़बाँ कभी
- आनंद नारायण मुल्ला
56. मुसलसल चीख़ता रहता है हम ये जंग जीतेंगे
जो हर लम्हा शिकस्त-ए-फ़ाश का एहसास रखता है
- मोहम्मद अब्दुल कबीर हनफ़ी
अगर आपको ये शायरी पसंद आई हो तो आप इन्हें अपने दोस्तों और करीबियों संग साझा कर सकते हैं। आप चाहें तो इन्हें अपने सोशल मीडिया अकाउंट से भी शेयर कर सकते हैं।
