हिंदी में किस कदर समा चुकी है उर्दू, बोलते-बोलते कब अपनी हो गई ये जुबान

अगर हिंदी और उर्दू के रिश्ते को समझना हो तो शायरी और कविता की दुनिया में चले जाइए। वहां शायद ही कोई ऐसा दरवाजा मिले जिस पर भाषा का पहरा हो।

किसी ने क्या खूब कहा है कि भाषाएं लोगों के साथ चलती हैं। उनके घरों में जाती हैं, बाजारों में घूमती हैं, गीतों में गुनगुनाती हैं और फिर एक दिन पता चलता है कि उन्होंने दूसरी भाषा के घर में भी अपनी जगह बना ली है। हिंदी और उर्दू के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।

Hindi and Urdu

हिंदी में भीतर तक बस चुकी है उर्दू

दोनों की अपनी साहित्यिक परंपराएं हैं। अपनी लिपियां हैं। अपनी पहचान है। वैसे जब बात हमारी रोजमर्रा की बोलचाल की आती है तो दोनों के बीच की दीवारें जैसे कहीं गायब हो जाती हैं। हम बोलते हिंदी हैं, लेकिन हमारी बातों में उर्दू के इतने शब्द घुले होते हैं कि कई बार खुद हमें पता नहीं चलता कि कौन सा शब्द कहां से आया और कब हमारी अपनी जुबान का हिस्सा बन गया।

End of Feed