Surendra Sharma Interview: मशहूर हास्य कवि और पद्मश्री से सम्मानित सुरेंद्र शर्मा ने टाइम्स नाऊ नवभारत के आई ओपनर की एक विशेष बातचीत में आज के हास्य, बदलते पारिवारिक रिश्तों, राजनीति, शिक्षा और युवाओं के रोजगार जैसे मुद्दों पर खुलकर बात की। अपनी चुटीली शैली के लिए पहचाने जाने वाले सुरेंद्र शर्मा ने कहा कि उनके हास्य का मकसद सिर्फ लोगों को हंसाना नहीं बल्कि ऐसी बात कहना है, जिससे सुनने वाला अपने भीतर भी झांके। इसी वजह से वह खुद कहते हैं कि उनका काम किसी को घायल करना नहीं, बल्कि एक तरह से चौकीदार की तरह कमियां दिखाना है।
हास्य कवि सुरेंद्र शर्मा का इंटरव्यू
उनकी बातचीत का बड़ा हिस्सा आज की कॉमेडी और पुराने दौर के हास्य के अंतर पर रहा। सुरेंद्र शर्मा ने कहा कि आज के दौर में हास्य कम और डबल मीनिंग ज्यादा दिखाई देता है। उनके मुताबिक समाज भी परिवार और सामूहिकता से धीरे-धीरे व्यक्तिगत जीवन की तरफ बढ़ गया है। उन्होंने कहा कि आज परिवार एक साथ बैठकर खाना तक नहीं खाता, क्योंकि हर सदस्य अपनी अलग स्क्रीन और अपनी अलग दुनिया में व्यस्त है।
‘मैं हास्य का चपरासी हूं’
अपनी लोकप्रियता और लंबे करियर के बावजूद सुरेंद्र शर्मा ने खुद को हास्य का 'सम्राट' मानने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि वह अभी भी 'हास्य का चपरासी' हैं और उनके लिए सीखने की गुंजाइश अभी बाकी है। उनका कहना है कि जिस दिन कोई खुद को बहुत बड़ा मान लेता है, उसी दिन ऊपर उठने की गुंजाइश खत्म हो जाती है। उन्होंने कलाकारों के सीखते रहने को जरूरी बताते हुए कहा कि संगीतज्ञ आखिरी समय तक छात्र बने रहते हैं, लेकिन कई लोग कुछ लाइनें लिखने के बाद ही खुद को बहुत बड़ा समझने लगते हैं।
82 की उम्र में फिटनेस का भी बताया राज
उन्होंने अपनी फिटनेस के पीछे कोई जटिल फार्मूला नहीं बताया, बल्कि कहा कि वह खाने में एक रोटी कम लेते हैं, मन में कटुता नहीं रखते और पुरानी बातों को जमा करके नहीं रखते हैं। सीक्रेट यही है कि किसी के सुख से दुखी मत रहो। दुख व्यक्तिगत है और सुख सार्वजनिक होना चाहिए। जिंदगी में बांटना सीखो, जो आपके पास है। उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने जीवन में जंक फूड नहीं खाया और घर का खाना पसंद किया। विदेश यात्रा में भी घर का खाना साथ ले जाते हैं।
पत्नी पर सबसे ज्यादा हास्य क्यों
सुरेंद्र शर्मा के हास्य में पत्नी और वैवाहिक जीवन से जुड़े प्रसंग बेहद लोकप्रिय रहे हैं। इस पर उन्होंने कहा कि पत्नी पर हास्य करने का उनका मकसद उपहास करना नहीं है। वह चाहते हैं कि हास्य में भी ऐसी बात कही जाए, जिसमें सामने वाला अपनी किसी कमी को पहचान सके। उन्होंने खुद को 'चौकीदार' की तरह बताया, जो जागने की आवाज देता है, न कि 'क्षत्रिय' जो किसी को घायल करे।
उनकी पत्नी को लेकर बातचीत भी उनके खास अंदाज में हुई। उन्होंने मजाक करते हुए कहा कि वह पत्नी की तरफ से 'डेपुटेशन' पर काम कर रहे हैं और कमाई घर पहुंचाते हैं, बदले में उन्हें जेब खर्च मिलता है। उन्होंने कहा कि वे पत्नी के सामने हंस भी नहीं पाते हैं।
विजिटिंग कार्ड में नहीं है ‘पद्मश्री’ का जिक्र
सुरेंद्र शर्मा ने अपनी सादगी का जिक्र करते हुए बताया कि उन्होंने अपने विजिटिंग कार्ड या लेटर पैड पर भी 'पद्मश्री' को प्रमुखता से नहीं लिखवाया। उन्होंने कहा कि सम्मान मिलने के बाद उन्होंने खुद इसका प्रचार नहीं किया। उन्होंने यह भी कहा कि किताब लिखना या नोटबुक बनाना उनकी आदत नहीं है। जो लाइनें याद रह जाती हैं, उन्हें मंच पर बोल देते हैं और जो याद नहीं रहतीं, उनके पीछे भागते नहीं हैं।
‘आज आलोचना सुनने की हिम्मत नहीं’
सुरेंद्र शर्मा ने अपने पुराने दिनों को याद करते हुए बताया कि उन्होंने बड़े-बड़े नेताओं के सामने भी राजनीतिक व्यंग्य सुनाया। उन्होंने विपक्षी नेताओं और तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों पर कविताएं लिखीं और उन्हें नेताओं के सामने सुनाया। उन्होंने बताया कि पुराने दौर के नेता आलोचना को सुनने और सहने की क्षमता रखते थे, जबकि आज उन्हें लगता है कि राजनीतिक वर्ग में आलोचना बर्दाश्त करने की क्षमता कम हुई है। इसी वजह से वह मौजूदा राजनीति पर उसी तरह की कविताएं लिखने से बचते हैं।
‘पढ़े-लिखे लोग बहुत मूर्ख हैं’
आज की शिक्षा व्यवस्था पर भी सुरेंद्र शर्मा ने तीखी टिप्पणी की। उनका कहना था कि केवल डिग्री हासिल कर लेना ही पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर साहित्य नहीं पढ़ाया जाएगा तो संस्कार कहां से आएंगे। उन्होंने नई पीढ़ी की भाषा और शिक्षा में साहित्य की घटती भूमिका पर सवाल उठाया। उन्होंने यह भी कहा कि आज पढ़े-लिखे लोग कई बार बहुत कुछ जानने के बावजूद समझ के स्तर पर कमजोर दिखाई देते हैं, जबकि पुराने दौर के कम पढ़े-लिखे लोगों में व्यवहारिक ज्ञान ज्यादा था।
वर्क फ्रॉम होम से बचा कंपनियों का खर्च
रोजगार और वर्क फ्रॉम होम पर सुरेंद्र शर्मा ने एक अलग नजरिया रखा। उन्होंने कहा कि घर से काम कराने पर बड़ी कंपनियों का ऑफिस, लंच और ट्रांसपोर्ट जैसे कई खर्च बच जाते हैं, जबकि कर्मचारी अकेले बैठकर ज्यादा घंटे काम कर सकता है। उन्होंने दावा किया कि कई स्थितियों में 8 घंटे का काम 11 घंटे तक खिंच जाता है और कर्मचारियों की संख्या भी कम की जा सकती है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब देश में रोजगार की जरूरत है तो ऐसी व्यवस्था क्यों न बनाई जाए, जिससे ज्यादा लोगों को काम मिले। उनका जोर इस बात पर था कि युवाओं के लिए सिर्फ डिग्री नहीं, काम पैदा करने की व्यवस्था जरूरी है।
डिग्री नहीं, काम की पढ़ाई पर जोर
उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में कौशल आधारित पढ़ाई बढ़ाने की वकालत की। उनका कहना था कि ऐसी शिक्षा दी जानी चाहिए, जिससे युवा सिर्फ नौकरी खोजने वाला न बने बल्कि काम करने और कारीगरी सीखने वाला भी बने। उन्होंने भारतीय हस्तशिल्प, बुनकरी, कारीगरी और पारंपरिक कौशल का उदाहरण देते हुए कहा कि देश में ऐसी प्रतिभा थी, जिसे सही तरीके से आगे बढ़ाया जाता तो रोजगार के बड़े अवसर पैदा होते। उनके अनुसार विकास का रास्ता केवल मशीनों से नहीं बल्कि उन लोगों से भी बनता है, जिन्हें काम करने के अवसर मिलते हैं।
‘देश में आदमी ज्यादा हैं, काम कम है’
बातचीत में उन्होंने भारत और दूसरे देशों की रोजगार स्थिति का तुलना के जरिए मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि कुछ देशों में काम ज्यादा है और काम करने वाले लोग कम, जबकि भारत में इसके उलट स्थिति दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि जरूरत इस बात की है कि देश की आबादी को बोझ नहीं बल्कि एसेट में बदला जाए। इसके लिए नए रोजगार पैदा करने और पारंपरिक कामों को दोबारा मजबूत करने की जरूरत है। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि किसी देश की तरक्की तब होती है, जब उसकी बैलेंस शीट में उसकी आबादी एसेट साइड में दिखाई दे।
‘आज देश पर हंसा जा रहा है, देश में नहीं’
सुरेंद्र शर्मा ने कहा कि आज के समय की समस्या यह है कि 'देश में नहीं हंसा जा रहा है, देश पर हंसा जा रहा है।' उन्होंने इस संदर्भ में पुरानी पीढ़ी के कवियों की पंक्तियों को याद किया और कहा कि देश को आगे बढ़ाने के लिए सोच और इच्छा शक्ति की जरूरत है।
उन्होंने विदेशों में भारतीयों की सफलता का उदाहरण देते हुए सवाल उठाया कि जब भारतीय बाहर जाकर अच्छा काम कर सकते हैं तो उन्हें देश छोड़कर जाने की जरूरत क्यों पड़ती है। उनके मुताबिक नीतियां ऐसी होनी चाहिए जिनसे लोग अपने देश में भी उसी तरह अवसर पा सकें।
परिवार में बढ़ रही हैं दूरियां
आज के परिवारों में बढ़ती दूरी को लेकर भी सुरेंद्र शर्मा ने चिंता जताई। उन्होंने कहा कि परिवार के लोग साथ होते हुए भी अलग-अलग स्क्रीन में व्यस्त हैं। रिश्तों और शादी के बदलते तरीके पर उन्होंने संयुक्त परिवारों की भूमिका का जिक्र किया और कहा कि बड़े-बुजुर्ग कई बार रिश्तों को संभालने की सीख देते हैं।
अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर इंदिरा गांधी तक सुनाईं कविताएं
सुरेंद्र शर्मा ने बातचीत में अपने लंबे सार्वजनिक जीवन के कई संस्मरण भी साझा किए। उन्होंने बताया कि उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी समेत कई बड़े नेताओं और सार्वजनिक हस्तियों के सामने कविताएं सुनाईं। उन्होंने अटल जी के साथ एक कमरे में कविता पाठ का अनुभव भी साझा किया। उन्होंने इंदिरा गांधी के साथ हुई मुलाकात का भी जिक्र किया और बताया कि उस समय वे राजनीतिक कविताएं लिखते थे। उन्होंने नेताओं के सामने भी अपनी राजनीतिक कविताएं सुनाईं और आलोचना से पीछे नहीं हटे।
‘अगला जन्म मिला तो इंसान बनना चाहूंगा’
अगर अगला जन्म चुनने का मौका मिले तो क्या वह फिर सुरेंद्र शर्मा बनना चाहेंगे, तो उनका जवाब भी उनके पूरे व्यक्तित्व की तरह अलग था। उन्होंने कहा कि शायद वह सुरेंद्र शर्मा न बन पाएं, लेकिन इंसान जरूर बनना चाहेंगे।
