पंजाब के गुम होते सुर: जब हर चौपाल थी मंच और हर गायक था फकीर, कहां खो गए तुंबी और इकतारा

समय के साथ सुरों की जगह शोर ने ले ली। संगीत डिजिटल होते गया और देखते-देखते बाज़ार बन गया। अफसोस कि रील्स, रैप और रीमिक्स के इस दौर में तुंबी और इकतारा मंचों से हटा दिए गए, किताबों में कैद हो गए और नई पीढ़ी के लिए ‘पुराने’ बन गए।

पंजाब की संस्कृति केवल वहां के उत्सवों, रंगों और खेतों तक ही सीमित नहीं है। इसमें लोक संगीत और लोक कलाओं का संगम भी है। एक समय था जब पंजाब के किसी भी मेले या चौपाल में लोक गायकों की आवाज सुन भीड़ इकट्ठा हो जाया करती थी। इन गुमनाम से लोक गायकों की आवाज में मिट्टी की सोंधी खुशबू, लोक की पीड़ा और इतिहास की गूंज होती थी। उनके पास तब न तो मंच था, ना ही माइक। बस हाथ में होता था एक तुंबी और इकतारा, जो उनके भीतर के संसार को आवाज देता था। इन दोनों वाद्यों की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि इनकी बनावट और सुर गांव के जीवन से सीधी जुड़ी हुई थी। तुंबी की थाप खेत की माटी की खुशबू सी लगती थी और इकतारा की गूंज भीतर कहीं आत्मा को छू जाती थी। तुंबी और इकतारा की सबसे खास बात ये थी कि इन्हें बजाने के लिए किसी प्रशिक्षण की जरूरत नहीं होती। मन और माटी से जुड़ा कलाकार इन्हें सहजता से बजा लेता था।

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गांव की गलियों से विदा होते सुर: तुंबी-इकतारे की आख़िरी पुकार

पंजाब और तुंबी-इकतारा

तुंबी और इकतारा क्या हैं?

तुंबी नारियल या लौकी के खोल से बनती थी। उसे धातु की तार और लकड़ी की डंडी से तैयार किया जाता था। तुंबी न तो भारी होती है और न दिखावटी। लेकिन जब कोई लोक गायक इसे छेड़ता तो वक्त ठहर सा जाता और मिट्टी बोल उठती थी। गिद्दे की बोलियों से हीर-रांझा की अमर कहानियों तक, तुंबी ने हर भावना को सुर दिया।

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