Kesariya Balam: तड़प से निकले शब्दों में दर्द ने भरी थी जान, आज है राजस्थान की पहचान, जानें ढोला और मारू की प्रेम कहानी से निकले इस गीत का मनोविज्ञान

History Of Kesariya Balam Song (केसरिया बालम आवो नी पधारो म्हारे देस): इस लोक गीत में रची बसी राजस्थान की माटी की खुशबू ने कभी ये सोचने का मौका ही नहीं दिया कि ये गीत कितना पुराना है और इसे सबसे पहले किसने गाया था। बस किसी का स्वागत करना हो तो अनायास ही जेहन में यह गीत आना लाजमी सा हो चुका है। लेकिन आपको शायद ही पता हो कि यह कोई स्वागत गान नहीं बल्कि विरह का गीत है।

केसरिया बालम आवो नी पधारो म्हारे देस जी..

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ढोला और मारू की लव स्टोरी से निकले केसरिया बालंम का पूरी इतिहास

इस एक लाइन में कहीं लिखा तो नहीं है लेकिन आप इस पढ़ते ही समझ जाएंगे कि बात राजस्थान की हो रही है। जी हां यह पंक्ति राजस्थान की पहचान बन चुकी है। 'केसरिया बालम..' यानी एक मीठी सी मनुहार जिसे गाकर पावणों को अपने 'देस' में न्यौता जाता है। शायद इस मनुहार की मिठास का ही असर है जो राजस्थान की सूखी धरती की तरफ देशी-विदेशी मेहमान अनायास ही खिंचते चले आते हैं। राजस्थान की संस्कृति का अभिन्न प्रतीक बन चुका है यह केसरिया बालम गीत।

केसरिया बालम

इस लोक गीत में रची बसी राजस्थान की माटी की खुशबू ने कभी ये सोचने का मौका ही नहीं दिया कि ये गीत कितना पुराना है और इसे सबसे पहले किसने गाया था। बस किसी का स्वागत करना हो तो अनायास ही जेहन में यह गीत आना लाजमी सा हो चुका है। लेकिन आपको शायद ही पता हो कि यह कोई स्वागत गान नहीं बल्कि विरह का गीत है। क्या है यह गीत और कैसे हुआ इसका जन्म, ये जानने से पहले आपको जानना होगा कि केसरिया बालम आखिर कहते किसे हैं।

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