Kachaudi Gali Song Meaning : कहा जाता है कि बनारस की सुबह अगर घाटों की आरती से शुरू होती है, तो उसका स्वाद कचौड़ी गली में जाकर पूरा होता है। यही कचौड़ी गली एक बार फिर से सुर्खियों में है। कारण है कोक स्टूडियो भारत सीजन 4. कोक स्टूडियो पर रेखा भारद्वाज, ख्वाब और उत्पल उदित की आवाज में भोजपुरी लोकगीत कचौड़ी गली ने इंटरनेट पर तहलका मचा रखा है।
क्या है कचौड़ी गाने गीत की असल कहानी (Photo: Coke Studio Bharat)
तीनों कलाकारों ने अपनी आवाज से जो समां बांधा है वो आपको एक अलग ही दुनिया में ले जाती है। बनारस की कचौड़ी गली और अधूरे इश्क की खुशबू को समेटे यह गीत सीधे रूह को छूता है। इसे ध्यान से सुनें तो लगता है जैसे कोई प्रेमिका बनारस की तंग गलियों में घूमते हुए अपने प्रीतम की यादों को टटोल रही हो। इस गीत में कहीं ठंडी होती चाय है, कहीं किसी के इंतजार में बीतती शामें हैं तो कहीं वह मासूमियत भी है जो छोटे शहरों के प्रेम में अब भी बची हुई है।
प्रेम नहीं विरह का राग है कचौड़ी गली
लेकिन क्या आप जानते हैं कि कचौरी गली सुन कइल बलमू..का इतिहास क्या है। यह लोकगीत सैकड़ों साल आखिर किस भाव को समेटे हुआ है जिसका जादू आज तक बरकरार है। आपको जानकर हैरानी होगी कि कचौड़ी गली प्रेम नहीं, विरह का गीत है। यह यूपी बिहार के गांवों की उन औरतों का दर्द है जो जबरन युद्ध में रंगून भेज दिये गए पति के विरह को झेल रही थीं।
19वीं सदी में ब्रिटेन और बर्मा के बीच सालों तक तीन टुकडो़ं में जंग हुई। 1824 से 1886 तक चलने वाले इस युद्ध में ब्रिटिश सेना को बड़ी संख्या में सैनिकों की जरूरत थी। अंग्रेजों ने जबरन भारतीयों को इस युद्ध का हिस्सा बनाया। बड़ी संख्या में बिहार, पूर्वांचल और आसपास के इलाकों से लोगों को रंगून भेजा गया। बताया जाता है कि तब लगभग 5000 भारतीयों को जोर जबरदस्ती से ब्रिटिश सेना का हिस्सा बनाकर लड़ने के लिए भेज दिया गया।
तो ऐसे बना कचौड़ी गली सून कइल बलमू..
बिहार और पूर्वांचल के मर्दों को ना चाहते हुए भी अपना घर-बार छोड़ कर जाना पड़ा। सालों तक औरतें अपने पतियों का इंतजार करती रहीं। इसमें से कुछ लौटे तो कुछ के सिर्फ शहीद होने की खबर आई। जो लौटे भी, उनमें से कई पहले जैसे नहीं रहे। पति से बिछड़ने का यही विरह सुर बनकर उन वीरान घरों में फूटने लगा। इसी विरह के राग से उपजा कचौड़ी गली सून कइले बलमू..। पढ़ें इस गीत के बोल:
सेजिया पे लोटे काला नाग हो
कचौड़ी गली सून कैले बलमु ।
मिर्जापुर कैले गुलजार हो,
कचौड़ी गली सून कैले बलमु ।
एही मिर्जापुर से उडल जहजिया,
सैंया चल गइल रंगून हो,
कचौड़ी गली सून कैले बलमु ।
पनवा से पातर भइल तोर धनिया,
देहिया गलेला जइसे नून हो,
कचौड़ी गली सून कैले बलमु ।
मनवा की बेदना बेदउ ना जाने,
करेजवा में लागल जैसे ख़ून हो,
कचौड़ी गली सून कैले बलमु ।
इतिहास ने भले ऐसे परिवारों के दर्द को भुला दिया हो, लेकिन कचौड़ी गली गीत उस पीड़ा की आवाज बनकर आज भी लोगों को रुला रही है।
