एक पुरानी पिस्तौल जिसपर खुदा था सात अंकों का एक नंबर- 168896। आप अगर आज इसे देखेंगे तो यह किसी पुरानी आम बंदूक जैसी ही लगेगी, हालांकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। यही वह .32 बोर की सेमी-ऑटोमैटिक कोल्ट पिस्तौल है, जो कभी भगत सिंह के पास थी। शहीद-ए-आजम ने इसी बंदूक से 17 दिसंबर 1928 को लाहौर में ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जेपी सांडर्स की हत्या की थी।
करीब 70 सालों तक 'गायब' रही भगत सिंह की पिस्तौल (AI Generated and Newsroom Verified Image)
8 अप्रैल 1929 को दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में बम फेंकने के बाद जब भगत सिंह ने गिरफ्तारी दी तब भी ये पिस्तौल उनके पास थी। फिर यह पिस्तौल अचानक इतिहास से गायब हो गई। करीब 88 साल तक किसी को पता नहीं था कि यह कहां है।
आपको जानकर हैरानी होगी कि भगत सिंह की यह ऐतिहासिक बंदूक एक समय तो ऐसी जगह भी पहुंच गई थी, जहां उसे सिर्फ एक पुराने हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा था। करीब नौ दशक बाद एक खोजी पत्रकार के जुनून ने इसे खोज निकाला और ऐसी जगह पहुंचाया जिसकी ये हकदार थी।
लाला लाजपत राय की मौत और बदले की आग
इस पूरी कहानी की शुरुआत 1928 में होती है। साइमन कमीशन के विरोध में लाहौर में हो रहे प्रदर्शन के दौरान पुलिस लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय बुरी तरह घायल हुए और 17 नवंबर 1928 को उनका निधन हो गया।
हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन यानी HSRA के क्रांतिकारियों ने लाठीचार्ज का बदला लेने का फैसला किया। 17 दिसंबर 1928 को भगत सिंह और शिवराम राजगुरु ने जिम्मेदार ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जेपी सांडर्स को गोली मार कर अपना बदला लिया। भगत सिंह ने जिस हथियार से लाला लाजपत राय की मौत का बदला लिया था, वह यही कोल्ट पिस्तौल थी।
सेंट्रल असेंबली में फिर दिखा वही हथियार
करीब चार महीने बाद, 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में बम फेंक कर अपनी गिरफ्तारी दी। पुलिस ने भगत सिंह को जब हिरासत में लिया तो उनके पास से एक पिस्तौल भी मिली। जांच में पता चला कि यही वह बंदूक है जिससे सांडर्स की हत्या हुई थी।
अंग्रेजों ने 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी। उनकी शहादत के बाद भी वह पिस्तौल ब्रिटिश पुलिस के रिकॉर्ड और मालखाने में मौजूद रही। फिर देश आजाद हुआ और यहीं से इस हथियार की कहानी का सबसे हैरान करने वाला अध्याय शुरू होता है।
आजादी के बाद पिस्तौल कहां चली गई?
1947 में देश के बंटवारे के दौरान पुराने केस रिकॉर्ड और सामान का भी बंटवारा हुआ। भगत सिंह से जुड़ी यह पिस्तौल भारत आई और जालंधर पुलिस लाइन्स के मालखाने में रख दी गई। भारतीय संवतंत्रता के इतिहास की नजर से देखें तो यह एक बेहद अहम चीज थी। फिर भी सरकारी रिकॉर्ड में इसकी पहचान उस तरह सुरक्षित नहीं रह सकी, जैसी होनी चाहिए थी।
1968 में पंजाब पुलिस के मालखाने में रखे कई पुराने और अप्रचलित हथियार सीमा सुरक्षा बल यानी BSF को सौंप दिए गए। इसी प्रक्रिया में यह पिस्तौल भी इंदौर स्थित BSF के सेंट्रल स्कूल ऑफ वेपन्स एंड टैक्टिक्स की वर्कशॉप तक पहुंच गई।
भगत सिंह की ऐतिहासिक पिस्तौल अब किसी संग्रहालय में नहीं थी। वह एक ट्रेनिंग वर्कशॉप में थी। वहां उसे एक पुराने इस्तेमाल किए हुए हथियार की तरह रखा गया। जवान उसके पुर्जे खोलते, उन्हें साफ करते, तेल लगाते और फिर हथियार को दोबारा जोड़ते। उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि जिस पिस्तौल ने कभी ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ क्रांति की मसाल जलाई थी, वह अब हथियारों की ट्रेनिंग का हिस्सा बन चुकी थी। विडंबना देखिए कि वहां किसी को यह मालूम ही नहीं था कि यह भारत मां के वीर सपूत भगत सिंह की पिस्तौल है।
एक नंबर ने खोल दिया 88 साल पुराना राज
साल 2016 में 'द ट्रिब्यून' के वरिष्ठ पत्रकार जुपिंदरजीत सिंह भगत सिंह और लाहौर षड्यंत्र केस से जुड़े दस्तावेजों पर काम कर रहे थे। पुरानी फाइलों और पुलिस रिकॉर्ड को खंगालते हुए उनकी नजर एक खास नंबर पर पड़ी- 168896। पता चला कि इसी नंबर की पिस्तौल से सांडर्स को मारा गया था।
अब जुपिंदरजीत सिंह ने इस एक नंबर के पीछे पूरी कहानी तलाशनी शुरू की। पुराने पुलिस रिकॉर्ड खंगाले, कोर्ट के तमाम कागजातों को पलटा, सांडर्स हत्या से जुड़ी रिपोर्टों को फिर से पढ़ा। अलग-अलग सरकारी रिकॉर्ड की कड़ियों को जोड़ते हुए इस पत्रकार ने पाया कि भगत सिंह वह पिस्तौल सिस्टम की लापरवाहियों के बीच अपने ही देश में कहीं गुमनाम पड़ी है।
सराकारी फाइलों की पड़ताल के बाद सुराग आखिर इंदौर की BSF वर्कशॉप तक पहुंचा। अब अगला सवाल था कि क्या वहां रखी पुरानी पिस्तौल वही है? इंदौर में रखी पिस्तौल को देखा गया। उसपर अंकित सीरियल नंबर की जांच हुई। नंबर वही था- 168896। करीब 88 साल बाद भगत सिंह की वह पिस्तौल एक पत्रकार के हाथ में थी।
जुपिंदरजीत सिंह ने इस पूरी खोज को अपनी किताब Bhagat Singh's Pistol: The Hunt for a Martyr's legacy में दर्ज किया है।
फिर पिस्तौल पहुंची भगत सिंह की धरती पर
पिस्तौल मिलने की खबर सामने आई तो स्वाभाविक रूप से देशभर में चर्चा हुई। सवाल उठे कि भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी से जुड़ा इतना महत्वपूर्ण हथियार इतने लंबे समय तक आम पुराने हथियार की तरह कैसे रखा गया। इसके बाद इसे पंजाब वापस लाने की प्रक्रिया शुरू हुई। आखिरकार अप्रैल 2017 में यह पिस्तौल पंजाब लाई गई।
इसका नया ठिकाना बना फिरोजपुर का हुसैनीवाला शहीद स्मारक म्यूजियम। यह जगह अपने आप में भगत सिंह की कहानी का बेहद अहम हिस्सा है। 23 मार्च 1931 को फांसी के बाद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के शवों का सतलुज के किनारे हुसैनीवाला में ही अंतिम संस्कार किया गया था।
आखिरकार जिस हथियार से भगत सिंह वे देश में क्रांति का बीज बोया था, वह उसी जगह आया जहां उनकी शहादत की आखिरी निशानी मौजूद है। आज यह पिस्तौल एक सुरक्षित कांच के केस में रखी है। अब कोई उसे पुराने मालखाने की चीज समझकर नहीं देखता।
