Parenting Tips in Hindi: आजकल बहुत से बच्चे स्मार्ट तो हैं लेकिन उनमें संस्कार की कमी नजर आती है। बड़ों का नमस्ते तक कहने में उन्हें झिझक होती है। पेरेंट्स को समझ नहीं आती कि बच्चों को संस्कारी कैसे बनाएं। पहले तो उन्हें यह समझना होगा कि संस्कारी बनाने का मतलब सिर्फ मंदिर ले जाना नहीं, बल्कि दिल में सम्मान, अनुशासन और नैतिकता डालना होता है। आज जब वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन कह रही है कि बच्चों में मेंटल हेल्थ इश्यूज 30% बढ़े हैं, संस्कार ही वो एंकर है जो उन्हें संभाल सकता है। संस्कार वो नींव हैं जिन पर बच्चे का पूरा व्यक्तित्व टिका होता है। इन आसान प्रैक्टिकल तरीकों से आप बच्चों को संस्कारी बना सकते हैं।
अपने बेटे के साथ एक्टर आर माधवन की फाइल फोटो (Photo: R Madhavan Insta)
खुद से करें शुरुआत
बच्चे कॉपीकैट होते हैं। वही सीखते हैं जो वो अपने माता-पिता को करते देखते हैं। अगर आप घर में बड़ों का सम्मान करेंगे, दूसरों की मदद करेंगे, झूठ नहीं बोलेंगे तो आपका बच्चा भी वही सीखेगा। बच्चों को संस्कारी बनाने की शुरुआत घर के वातावरण से होती है, न कि किताबों से। इसलिए हमेशा वैसा ही आचरण रखें जैसा चाहते हैं कि आपके बच्चा करे।
जादू भरे तीन शब्द
बतौर पेरेंट्स आप बच्चों को तीन जादुई शब्द बोलना जरूर सिखाएं। ये तीन शब्द है - प्लीज, सॉरी और थैंकयू। ये तीन शब्द छोटे जरूर हैं लेकिन बच्चों के व्यक्तित्व में बड़ा असर डालते हैं। बच्चों को सिखाएं कि हर छोटी चीज के लिए आभार जताना, अपनी गलती स्वीकार करना और विनम्र रहना ही असली संस्कार हैं।
बड़ों का आदर और अनुशासन
संस्कार का मतलब सिर्फ धार्मिक बातें नहीं होतीं, बल्कि अनुशासन और आदरभाव भी इसमें शामिल हैं। बच्चों को घर के बड़े-बुजुर्गों से मिलने, उनके अनुभव सुनने और उनका आशीर्वाद लेने की आदत डालें।
सेवा और करुणा का भाव जगाएं
बच्चों को सिखाएं कि दूसरों की मदद करना, कमजोरों के प्रति दया रखना और जरूरतमंदों की सहायता करना सबसे बड़ा पुण्य है। किसी गरीब बच्चे को कपड़े दान करना जैसी छोटी-छोटी बातें उसके जीवन में बड़ा असर छोड़ती है। उसे समझाना जरूरी है कि सेवा के बाद मिलने वाली खुशी ही असली खुशी है।
मोबाइल से थोड़ा दूर रखें
टेक्नोलॉजी जरूरी है, लेकिन बचपन में उसका ज्यादा असर बच्चों को भावनात्मक रूप से कमजोर बना देता है। उन्हें बाहर खेलने, दोस्तों से मिलने और परिवार के साथ समय बिताने के लिए प्रोत्साहित करें।
बुजुर्गों की सोहबत में रखें
बच्चों को संस्कार सिखाने के लिए आप उन्हें उनके दादा-दादी या नाना-नानी के साथ भरपूर समय बिताने दें। वो जो बातें सिखा सकते हैं वो शायद हम आप ना कर पाएं। वो लोग रामायण महाभारत की कहानियां सुनाते हैं जो बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में अहम भूमिका निभाते हैं।
संस्कार एक दि्न में सीखने वाली चीज नहीं है। ये तो रोज अभ्यास से ही आती है। जिस तरह से पौधे को हर दिन पानी चाहिए, वैसे ही बच्चे को हर दिन अच्छे व्यवहार और सकारात्मक माहौल की जरूरत होती है। जब माता-पिता खुद संस्कारी बनेंगे, तब बच्चे भी वही सीखेंगे और यही है असली “संस्कार की शिक्षा”, जो जीवनभर साथ रहती है।
