Akhbar Shayari in Hindi: अखबार हम इंसानों की रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा है। आज भी बड़ी संख्या में लोगों की सुबह चाय और अखबार के साथ ही होती है। ये अखबार रोज सुबह हमें समाज का आईना दिखाते हैं। यह हमें पूरी दुनिया से जोड़ते हैं। अखबार मात्र सूचना प्रसार का माध्यम ही नहीं बल्कि हमारी सोच और विचार को विकसित करने का जरिया भी है। आज भले ही डिजिटल मीडिया और ऑनलाइन न्यूज पोर्टल्स तेजी से बढ़ रहे हों, लेकिन अखबार के पन्नों पर छपे हुए शब्दों की की विश्वसनीयता और उसकी खुशबू अब भी लोगों को आकर्षित करती है। इसी अखबार पर देश दुनिया के कई मशहूर शायरों ने खूबसूरत शेर लिखे हैं। आइए पढ़ें अखबार पर शायरी:
अखबार पर शायरी (Photo: AI Image)
1. खींचो न कमानों को न तलवार निकालो
जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो
- अकबर इलाहाबादी
2. हमारे शहर के लोगों का अब अहवाल इतना है
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना
- अदा जाफ़री
3. इस वक़्त वहां कौन धुंआ देखने जाए
अख़बार में पढ़ लेंगे कहां आग लगी थी
- अनवर मसूद
4. दस बजे रात को सो जाते हैं ख़बरें सुन कर
आख खुलती है तो अख़बार तलब करते हैं
- शहज़ाद अहमद
5. सुर्ख़ियां ख़ून में डूबी हैं सब अख़बारों की
आज के दिन कोई अख़बार न देखा जाए
- मख़मूर सईदी
6. रात के लम्हात ख़ूनी दास्तां लिखते रहे
सुब्ह के अख़बार में हालात बेहतर हो गए
- नुसरत ग्वालियारी
7. 'वसीम' ज़ेहन बनाते हैं तो वही अख़बार
जो ले के एक भी अच्छी ख़बर नहीं आते
- वसीम बरेलवी
8. इश्क़ अख़बार कब का बंद हुआ
दिल मिरा आख़िरी शुमारा है
- फ़रहत एहसास
9. अद्ल-गाहें तो दूर की शय हैं
क़त्ल अख़बार तक नहीं पहुंचा
- साहिर लुधियानवी
10. ऐसे मर जाएं कोई नक़्श न छोड़ें अपना
याद दिल में न हो अख़बार में तस्वीर न हो
- ख़लील मामून
11. नाख़ुदा देख रहा है कि मैं गिर्दाब में हूं
और जो पुल पे खड़े लोग हैं अख़बार से हैं
- गुलज़ार
12. चश्म-ए-जहां से हालत-ए-असली छुपी नहीं
अख़बार में जो चाहिए वो छाप दीजिए
- अकबर इलाहाबादी
13. चेहरे पे जो लिखा है वही उस के दिल में है
पढ़ ली हैं सुर्ख़ियां तो ये अख़बार फेंक दे
- शहज़ाद अहमद
14. कुछ ख़बरों से इतनी वहशत होती है
हाथों से अख़बार उलझने लगते हैं
- भारत भूषण पन्त
15. अख़बार में रोज़ाना वही शोर है यानी
अपने से ये हालात संवर क्यूं नहीं जाते
- महबूब ख़िज़ां
16. कुछ हर्फ़ ओ सुख़न पहले तो अख़बार में आया
फिर इश्क़ मिरा कूचा ओ बाज़ार में आया
- इरफ़ान सिद्दीक़ी
17. खुलेगा उन पे जो बैनस्सुतूर पढ़ते हैं
वो हर्फ़ हर्फ़ जो अख़बार में नहीं आता
- रऊफ़ ख़ैर
18. अर्से से इस दयार की कोई ख़बर नहीं
मोहलत मिले तो आज का अख़बार देख लें
- आशुफ़्ता चंगेज़ी
19. रात-भर सोचा किए और सुब्ह-दम अख़बार में
अपने हाथों अपने मरने की ख़बर देखा किए
- मोहम्मद अल्वी
20. तुझे शनाख़्त नहीं है मिरे लहू की क्या
मैं रोज़ सुब्ह के अख़बार से निकलता हूं
- शोएब निज़ाम
बता दें कि अखबार हमें यह भी याद दिलाता है कि जानकारी सिर्फ पढ़ने भर के लिए ही नहीं होती। ये सोचने, समझने और समाज को बेहतर बनाने के लिए भी होती है।
