15 अगस्त 1947 की सुबह भारत के लिए एक नया सवेरा ले कर आई। सदियों की गुलामी का अंत हुआ। दिल्ली की सड़कों पर जश्न था। हवाओं में आजादी की सांस थी। लेकिनउस वक्त पूरी दुनिया भारत को किस नजर से देख रही थी? क्या दुनिया के ताकतवर और विकसित देशों को भारत के लोकतंत्र पर भरोसा था? आइए जानते हैं कि 1947 में दुनिया के सबसे बड़े अखबारों ने भारत की आजादी पर क्या लिखा था।
भारत की आजादी पर कैसा था विदेशी मीडिया का रुख (AI Generated Image)
द न्यू यॉर्क टाइम्स (The New York Times)
15 अगस्त 1947 को अमेरिका के प्रमुख अखबार 'द न्यू यॉर्क टाइम्स' ने इसे अपनी लीड स्टोरी बनाया। अखबार की हेडलाइन थी - India and Pakistan Become Nations; Clashes Mar Freedom (भारत और पाकिस्तान राष्ट्र बने; हिंसा ने आजादी के रंग में भंग डाला)।
अखबार ने भारत की आजादी का स्वागत किया, साथ ही बंटवारे के दर्द को भी दुनिया के सामने रखा। रिपोर्ट में लिखा गया कि ब्रिटिश साम्राज्य का अंत हो गया है, लेकिन दो नए देशों का जन्म खून-खराबे के बीच हो रहा है। अखबार में भारत पाक्सतिान बॉर्डर के दोनों तरफ होने वाले खून खराबों पर गहरी चिंता जताई थी।
द गार्डियन (The Guardian)
ब्रिटेन के अखबार 'द गार्डियन' (तब 'मैनचेस्टर गार्डियन') का रुख अलग था। अखबार ने लिखा- An Era Closes: Power Handed Over (एक युग का अंत: सत्ता का हस्तांतरण)। अखबार ने वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन और जवाहरलाल नेहरू के ऐतिहासिक कदमों की तारीफ की। 'द गार्डियन' ने इसे ब्रिटिश इतिहास का एक जिम्मेदारी भरा फैसला माना। उसने भारत को गढ़ने में ब्रिटिश हुकूमत की भूमिका को काफी महत्वपूर्ण भी बताया था।
टाइम्स नाउ नवभारत पर ये भी पढ़ें: जानिए जंग-ए-आजादी की सबसे बुलंद आवाज कैसे बना एक माइक
द टाइम्स (The Times)
'द टाइम्स' उस वक्त ब्रिटेन का सबसे प्रतिष्ठित और सत्ता के करीब रहने वाला अखबार था। अखबार की हेडलाइन थी - India and Pakistan: The Transfer of Power (भारत और पाकिस्तान: सत्ता का हस्तांतरण)।
इस अखबार ने बहुत सधी हुई भाषा का इस्तेमाल किया। इसने 'आजादी' से ज्यादा 'सत्ता हस्तांतरण' शब्द पर जोर दिया। अखबार ने लिखा कि 200 साल का ब्रिटिश राज खत्म हो रहा है। यह ब्रिटेन के लिए एक भावुक क्षण है। लेकिन दोनों नए देशों के सामने गरीबी, अशिक्षा और हिंसा जैसी बहुत बड़ी चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं।
द वाशिंगटन पोस्ट (The Washington Post)
अमेरिकी मीडिया में भारत की आजादी को लेकर खासा उत्साह था। दरअसल अमेरिका खुद भी ब्रिटिश साम्राज्य से आजाद हुआ था। अखबार की हेडलाइन थी- India Assumes Freedom, Two Dominions Are Created (भारत ने आजादी हासिल की, दो अधिराज्यों का निर्माण हुआ)।
'द वाशिंगटन पोस्ट' ने दिल्ली की सड़कों पर उमड़ी लाखों की भीड़ का खास जिक्र किया। अखबार ने लिखा कि आधी रात को जब दुनिया सो रही थी, तब एक नए युग की शुरुआत हुई। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि कैसे महात्मा गांधी इन जश्नों से दूर कोलकाता में शांति का प्रयास कर रहे थे।
द डेली टेलीग्राफ (The Daily Telegraph)
ब्रिटेन के इस रूढ़िवादी माने जाने वाले अखबार का लहजा थोड़ा अलग था। अखबार की हेडलाइन थी- End of the British Raj in India (भारत में ब्रिटिश राज का अंत)।
इस अखबार ने उन ब्रिटिश अधिकारियों, वॉयसरॉय और सैनिकों की विदाई को प्रमुखता से छापा। उन ब्रिटिश परिवारों का दर्द बयां किया गया, जिन्होंने अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा भारत में गुजारा था। इसमें भारत के भविष्य को लेकर काफी संशय भी जाहिर किया गया था।
टाइम्स नाउ नवभारत पर ये भी पढ़ें: जब अपने ही कुत्ते का खाना बाथरूम में छिपकर खाने लगीं एडविना माउंटबेटन
अल्बर्ट आइंस्टीन ने जमकर की तारीफ
महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन भारत के अहिंसा आंदोलन से बेहद प्रभावित थे। 1947 में भारत की आजादी पर उन्होंने महात्मा गांधी के अहिंसक संघर्ष की सराहना की। आइंस्टीन का मानना था कि भारत ने दुनिया को एक नया रास्ता दिखाया है। बिना हथियारों के इतने बड़े साम्राज्य को हराना एक चमत्कार था।
जॉर्ज ऑरवेल को सता रही थी चिंता
प्रसिद्ध ब्रिटिश लेखक और पत्रकार जॉर्ज ऑरवेल का जन्म भारत (बिहार के मोतिहारी) में हुआ था। वह साम्राज्यवादी सोच के कड़े आलोचक थे। ऑरवेल ने अपने लेखों में स्वीकार किया कि ब्रिटेन को बहुत पहले भारत छोड़ देना चाहिए था। हालांकि, उन्होंने बंटवारे के बाद पैदा हुई हिंसक परिस्थितियों पर चिंता भी जताई थी।
इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अपनी प्रसिद्ध किताब 'इंडिया आफ्टर गांधी' (India After Gandhi) में उस दौर के पश्चिमी नजरिए का बारीक विश्लेषण किया है। उनके मुताबिक पश्चिमी मीडिया और विश्लेषकों का मानना था कि भारत बहुत विविधता भरा देश है। यहां सैकड़ों भाषाएं हैं। अनगिनत जातियां और धर्म हैं। गरीबी और अशिक्षा बहुत ज्यादा है।
ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने तो भारत की आजादी का कड़ा विरोध किया था। संसद में दिए अपने भाषण में चर्चिल ने कहा था कि भारत एक देश नहीं है। यह सिर्फ एक भौगोलिक अभिव्यक्ति है। यह बर्बरता के दौर में वापस लौट जाएगा।
पश्चिमी दुनिया को लगता था कि भारत एक स्वतंत्र लोकतंत्र के रूप में ज्यादा दिन नहीं टिक पाएगा। जल्द ही यहां गृहयुद्ध शुरू हो जाएगा। दुनिया के कई देशों को लगता था कि भारत बिखर जाएगा। लेकिन भारत ने हर भविष्यवाणी को गलत साबित किया।
भारत का अस्तित्व में बने रहना ही 20वीं सदी का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक चमत्कार है। भारत न सिर्फ एकजुट रहा, उसने दुनिया के सबसे बड़े और मजबूत लोकतंत्र की नींव रखी। 1947 की वो सुर्खियां आज इतिहास का हिस्सा हैं, और भारत का लोकतंत्र एक जीती-जागती सच्चाई।
