Ball Swing: टी20 विश्व कप अब अपने अंतिम पड़ाव में है। 29 जून को इस विश्व कप का आखिरी यानी की फाइनल मुकाबला खेला जाएगा। इस विश्व कप में अबतक एक से बढ़कर एक खिलाड़ी का प्रदर्शन देखने को मिला है और स्विंग का जादू भी दिखाई दिया है। बीते दिनों भारत और इंग्लैंड के बीच खेले गए सेमीफाइनल मुकाबले में विराट कोहली, फिलिप सॉल्ट जैसे कई खिलाड़ियों को स्विंगबाजों की वजह से पवेलियन वापस लौटना पड़ा। ऐसे में आज हम समझेंगे कि आखिर गेंद स्विंग कैसे करती हैं? और क्या आउट स्विंग और इन स्विंग में हवा की भूमिका होती है।
बॉल स्विंग कैसे होती है? (फोटो साभार: BCCI)
चर्चा में रहे स्विंग गेंदबाज
हमेशा से स्विंग गेंदबाजों ने खूब सुर्खियां बटोरी हैं, इनमें सरफराज नवाज, इमरान खान, वसीम अकरम, वकार यूनुस, जेम्स एंडरसन, डेल स्टेन, ग्लेन मैकग्राथ, भुवनेश्वर कुमार जैसे बहुत से नाम शामिल हैं। इन गेंदबाजों के सामने अच्छे-अच्छे बल्लेबाजों का बल्ला खामोश हो जाता था तो चलिए अब स्विंग को समझते हैं।
स्विंग का अर्थ है झूलना यानि हवा में गेंद कितनी झूलती है यह सीम की डायरेक्शन से तय होता है। नई गेंद और पुरानी गेंद दोनों अलग-अलग तरह से स्विंग करती हैं। ऐसा माना जाता है कि नई गेंद से स्विंग और पुरानी गेंद से रिवर्स स्विंग कराई जाती है। हालांकि, रिवर्स स्विंग अब ज्यादा देखने को नहीं मिलती है।
पारंपरिक स्विंग क्या है?
आप लोगों ने देखा होगा शुरुआती ओवर हमेशा तेज गेंदबाज से कराए जाते हैं, क्योंकि नई गेंद अक्सर बल्लेबाजों को परेशान करती है और स्विंग होती है। दरअसल, नई गेंद की चमक से मिलने वाले स्विंग को ही पारंपरिक स्विंग कहा जाता है। दरअसल, गेंदबाद सीम और चमक का इस्तेमाल कर सही तरीके से इन स्विंग और आउट स्विंग कराता है।
इन स्विंग कराने के लिए गेंदबाज दो उंगलियों के बीच सीम को रखता है और सीम की दिशा लेग स्लिप की तरफ रखता है तो इन स्विंग होती है, जबकि सीम की दिशा पहली स्लिप की तरफ रखने से आउट स्विंग होती है। अच्छी स्विंग इस बात पर भी निर्भर करती है कि गेंदबाज ने सीम को कितना सटीक रखा है।
बाल स्विंग कैसे होती है?
रिवर्स स्विंग क्या है?
मॉर्डन डे क्रिकेट में रिवर्स स्विंग कम ही देखने को मिलती है, लेकिन इसका सबसे बढ़िया उदाहरण टेस्ट में देखने को मिलता है जब गेंद 30-35 ओवर के बाद पुरानी या कहें खुरदुरी हो जाती है तब जाकर गेंदबाज रिवर्स स्विंग का कमाल दिखा पाता है। दरअसल, गेंदबाज गेंद के एक हिस्से को खुरदुरा ही छोड़ देता है और दूसरे हिस्से का चमकाता है। ऐसी स्थिति में जब गेंद हवा में छूटती है तो पारंपरिक स्विंग से उलट चमकीले साइड की ओर स्विंग जाती है। इसी वजह से इसे रिवर्स स्विंग कहा जाता है।
रिवर्स स्विंग के पीछे का विज्ञान?
रिवर्स स्विंग के पीछे बरनौली थ्योरम काम करती है। बरनौली थ्योरम कहती है कि जहां वेलोसिटी ज्यादा होती है वहां प्रेशर कम होता है और जहां पर वेलोसिटी कम होती है वहां पर प्रेशर ज्यादा होता है। आसान शब्दों में इसे इस प्रकार समझा जा सकता है आप लोगों ने देखा होता कि मैच के बीच बीच में गेंद को एक तरफ से चमकाया जाता है। ऐसे में अगर गेंद पुरानी है और एक तरफ से उसका चमका दिया गया है यानी हवा में उसकी वेलोसिटी कम होगी और उस तरफ प्रेशन ज्यादा होगा। गेंद जब हवा में रहती है तो जिस ओर खुरदुरा साइड होता है वह हवा में उसी दिशा की ओर झूल जाती है। इसी प्रकार रिवर्स स्विंग का कॉन्सेप्ट काम करता है।
रिवर्स स्विंग की खोज कहां हुई?
रिवर्स स्विंग का जनक पाकिस्तान के तेज गेंदबाज सरफराज नवाज को माना जाता है। उन्होंने ही इमरान खान को रिवर्स स्विंग सिखाई थी और उनके बाद यह वसीम अकरम और वकार यूनुस तक पहुंची। शुरुआती दिनों में इसे बॉल टेम्परिंग से जोड़ा जाता था।
गेंद चमकाने के लिए क्या करते हैं गेंदबाज?
गेंदबाज पहले गेंद चमकाने के लिए सलाइवा या कहें थूक का इस्तेमाल करते थे, लेकिन कोरोना महामारी की वजह से गेंद चमकाने के लिए थूक के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। जिसके बाद खिलाड़ी पसीने का इस्तेमाल करने लगे थे।
