Sri Krishna Sudarshan Chakra to Protect India's Skies: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि भारत अपने नागरिकों और बुनियादी ढांचे को दुश्मन के हमलों, चाहे वे आतंकवादी हों या किसी और तरह के, इनसे बचाने के लिए 'सुदर्शन चक्र' बनाएगा। यह एक 'बहु-स्तरीय ढांचा' होगा, जिसमें एडवांस निगरानी, साइबर सुरक्षा और फिजिकल सुरक्षा उपायों को एकीकृत किया जाएगा।
इजरायल के आयरन डोम से भी एडवांस 'सुदर्शन चक्र' क्या है
यह नया सुरक्षा कवच इजरायल के बहुचर्चित 'आयरन डोम' और संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रस्तावित 'गोल्डन डोम' जैसा ही होगा। भारत के पास पहले से ही एक ऐसा ही सिस्टम मौजूद है; वो है 'एकीकृत वायु कमान और नियंत्रण प्रणाली' (Integrated Air Command and Control System) यह एक ऐसी बाधा थी जिसे पाकिस्तान की मिसाइलें 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान लगभग 100 घंटों तक भेद नहीं पाई थीं।
'मिशन सुदर्शन चक्र', हिंदू पौराणिक कथाओं की एक कहानी से प्रेरित है, जिसमें श्री कृष्ण ने अर्जुन को जयद्रथ को हराने में मदद करने के लिए, यानी अच्छाई को बुराई पर जीत दिलाने के लिए, सूर्य को ढाल बनाकर छिपाया था। तो ऐसी ही उम्मीद है कि यह मिसाइलों के खिलाफ सिर्फ एक ढाल से कहीं ज्यादा होगा।
PM मोदी ने पिछले अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में कहा था, '2035 तक, मैं इस ढाल का विस्तार करना, इसे मजबूत बनाना और इसका आधुनिकीकरण करना चाहता हूं। भगवान कृष्ण से प्रेरणा लेते हुए, हमने सुदर्शन चक्र का मार्ग चुना है... यह पूरी प्रणाली भारत में ही शोधित, विकसित और निर्मित होनी चाहिए।' प्रधानमंत्री ने कहा था, 'हर नागरिक को सुरक्षित महसूस होना चाहिए।'
सुदर्शन चक्र कैसा होगा?
बेशक, इस समय इसके ऑपरेशनल विवरण बहुत कम उपलब्ध हैं, लेकिन बताया जा रहा है कि सुदर्शन चक्र में संभवतः सटीक जवाबी हमला करने की क्षमताएं भी होंगी और इसमें हैकिंग या फिशिंग जैसे डिजिटल खतरों को बेअसर करने के लिए साइबर युद्ध-रोधी उपाय भी शामिल होंगे। यह भी बताया गया कि 'मिशन सुदर्शन चक्र' में प्रमुख वैज्ञानिक और रक्षा अनुसंधान एजेंसियों, सेना और निजी क्षेत्र के इनोवेटर्स के बीच सहयोग शामिल होगा।
सुदर्शन चक्र न केवल हवाई खतरों को बेअसर करेगा, बल्कि जमीनी लक्ष्यों पर भी निशाना साधेगा, जिससे एडवांस निगरानी, अवरोधन और जवाबी हमला करने की क्षमताएं एक ही बहुमुखी प्रणाली में शामिल हो जाएंगी। 2035 तक की समय-सीमा और भारत के चल रहे प्रोजेक्ट कुशा (रूस के एस-500 के समान) से भी अधिक जटिलता के साथ, सुदर्शन चक्र भारत की रणनीतिक स्थिति को, विशेष रूप से पाकिस्तान और चीन से आने वाले खतरों का मुकाबला करने में, नए सिरे से परिभाषित करने का वादा करता है।
पाकिस्तान नहीं हो पाया सफल
'सुदर्शन चक्र' योजना का संदर्भ अप्रैल में हुआ पहलगाम आतंकी हमला और मई में चलाया गया 'ऑपरेशन सिंदूर' है। 7 मई से शुरू होकर, लगभग 100 घंटों तक पाकिस्तान ने भारतीय सैन्य ठिकानों को तबाह करने, भारतीय लड़ाकू विमानों को मार गिराने और भारत के शहरों व कस्बों पर हमला करने की कोशिश की। भारत की सशस्त्र सेनाएं और मिसाइल रक्षा प्रणालियां पूरी मजबूती से डटी रहीं। और, पाकिस्तान की इस नाकामी से एक बहुत ही कीमती सबक मिला।
महत्वपूर्ण सैन्य और नागरिक संस्थानों, जैसे बिजली ग्रिड, संचार नेटवर्क, भोजन और जल आपूर्ति, चिकित्सा देखभाल, रक्षा प्रणालियां के चारों ओर सैन्य और तकनीकी सुरक्षा की परतों को मजबूत और बेहतर बनाने की आवश्यकता है; क्योंकि ये संस्थान दुश्मन ताकतों के लिए उच्च प्राथमिकता वाले लक्ष्य होते हैं।
आसमान में भारत के रक्षक
'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान, पाकिस्तान पर हवाई वर्चस्व बनाए रखने में भारत की IACCS ने एक निर्णायक भूमिका निभाई थी। इसने सबसे पहले, सेना, वायु सेना और नौसेना के हवाई रक्षा प्रणालियों को एक ही प्रणाली में मिलाकर ऐसा किया; यह प्रणाली आने वाले खतरों को वास्तविक समय में ट्रैक करती है और उन्हें बेअसर करती है। IACCS ने भारत को एक 'नेट-सेंट्रिक ऑपरेशनल क्षमता' प्रदान की, जो आज के युद्धों में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
असल में, IACCS रडार जैसे एयर डिफेस सिस्टम, AWACS (एयरबोर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम) जैसे सर्विलांस सिस्टम और फाइटर जेट्स के बीच तालमेल बिठाता है, उन्हें इंटीग्रेट करता है और उन्हें कंट्रोल करता है। और, इसके बदले में, IACCS सेना की सिचुएशनल अवेयरनेस को बढ़ाता है, जिससे वह खतरे के प्रकार के आधार पर सैनिकों, साजो-सामान या अन्य संसाधनों को तैनात कर पाती है।
सुदर्शन चक्र को संभवतः IACCS और उसके अपने मल्टी-लेयर्ड एयर डिफेंस सिस्टम को मुख्य आधार बनाकर विकसित किया जाएगा, जिसमें सेना का स्वदेशी 'आकाशतीर' नेटवर्क भी शामिल होगा।
इज़राइल के 'आयरन डोम' (और 'एरो') पर विचार करें। यह दुनिया का एक पावरफुल सुरक्षा कवच माना जाता है। फिलहाल इजरायल ईराव के साथ युद्ध लड़ रहा है और उसमें आयरन डोम ईरानी मिसाइलों को गिराने में लगा हुआ है।
इजरायल का आयरन डोम
इजरायल के आयरन डोम एयर डिफेंस सिस्टम ने 2011 में काम शुरू करने के बाद से हजारों रॉकेटों को रोका है, जिससे संघर्ष के समय देश को जरूरी सुरक्षा मिली है।
2006 के लेबनान युद्ध के बाद, इजरायल ने शुरू में अकेले ही 'आयरन डोम' को विकसित किया था; बाद में इसमें संयुक्त राज्य अमेरिका भी शामिल हो गया, जिसने इस कार्यक्रम के लिए अपनी रक्षा-संबंधी विशेषज्ञता और अरबों डॉलर की वित्तीय सहायता प्रदान की है।
इजरायली रक्षा कंपनी 'राफेल' के अनुसार, जिसने इसे डिजाइन करने में मदद की थी, उसके मुताबिक, इस प्रणाली की इंटरसेप्शन दर (हमलों को रोकने की दर) लगभग 90 प्रतिशत है।
