भारत में बाघ संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए पश्चिम बंगाल के बक्सा टाइगर रिजर्व में शुक्रवार को एक बाघिन को जंगल में छोड़ा गया। यह कदम बक्सा में बाघों की स्थायी और आत्मनिर्भर आबादी फिर से स्थापित करने की व्यापक योजना का हिस्सा है। कार्यक्रम में केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी मौजूद रहे।
बक्सा टाइगर रिजर्व में लौटी बाघों की उम्मीद।
यह पहल वन्यजीव सप्ताह 2026 की शुरुआत के साथ हुई है। बक्सा में बाघों की संख्या को फिर से बढ़ाने के लिए चरणबद्ध तरीके से काम किया जा रहा है। बिहार के वाल्मीकि टाइगर रिजर्व से लाई गई इस बाघिन को जंगल में छोड़ने से पहले उसके स्वास्थ्य, पर्यावरणीय परिस्थितियों और प्रबंधन से जुड़े जरूरी पहलुओं का वैज्ञानिक आकलन किया गया।
क्यों अहम है बक्सा टाइगर रिजर्व?
बक्सा उत्तर बंगाल में बाघों के लिए ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है। वर्ष 1983 में इसे टाइगर रिजर्व घोषित किया गया था। यह क्षेत्र भूटान और असम के जंगलों तथा संरक्षित इलाकों से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसे एक बड़े और महत्वपूर्ण पारिस्थितिक क्षेत्र का हिस्सा माना जाता है। हालांकि, पिछले कुछ दशकों में जंगलों के क्षरण और उनके हिस्सों में बंटने, भूमि उपयोग में बदलाव तथा शिकार की उपलब्धता घटने जैसे कारणों से यहां बाघों के लिए जरूरी परिस्थितियां प्रभावित हुईं। इसका असर बाघों की स्थायी आबादी पर पड़ा और रिजर्व में लंबे समय तक बाघों की स्थिर आबादी कायम नहीं रह सकी।2018 से चल रहा है बाघों की वापसी का प्रयास
बक्सा में बाघों की वापसी के लिए पश्चिम बंगाल सरकार ने नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (NTCA) और वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) के सहयोग से Tiger Augmentation and Recovery Project शुरू किया। वर्ष 2018 से चल रही इस पहल का फोकस सिर्फ बाघों को जंगल में छोड़ने पर नहीं, बल्कि उनके लिए जरूरी पूरा पारिस्थितिक आधार तैयार करने पर है।इसके तहत जंगल के आवास में सुधार, शिकार प्रजातियों की संख्या बढ़ाना, सुरक्षा और निगरानी मजबूत करना, वैज्ञानिक अध्ययन और वनकर्मियों की क्षमता बढ़ाने जैसे कदम उठाए गए हैं। शिकार की उपलब्धता बढ़ाने के लिए अब तक 800 से ज्यादा चीतल छोड़े जा चुके हैं। वहीं, पिछले आठ वर्षों में करीब 380 हेक्टेयर घास के मैदानों को बहाल या विकसित किया गया है। निगरानी के दौरान शिकार प्रजातियों की संख्या में बढ़ोतरी के सकारात्मक संकेत भी मिले हैं।
कैमरा ट्रैप में कई बार दिखे बाघ
बक्सा में पिछले कुछ वर्षों में बाघों की मौजूदगी के प्रमाण भी मिले हैं। कैमरा ट्रैप में 2021, 2023 और 2026 में बाघों की तस्वीरें दर्ज की गईं। 2023 में कैमरे में कैद एक बाघ की पहचान असम के मानस टाइगर रिजर्व में मौजूद बाघ से हुई। इससे यह संकेत मिला कि आसपास के बाघ आवासों के बीच बाघों की प्राकृतिक आवाजाही अभी भी संभव है। विशेषज्ञों के लिए यह बक्सा क्षेत्र में बाघों की वापसी की संभावनाओं को समझने में महत्वपूर्ण जानकारी है।बाघिन की रिहाई के बाद होगी कड़ी निगरानी
वाल्मीकि टाइगर रिजर्व से लाई गई बाघिन को जंगल में छोड़ना इस रिकवरी प्रोग्राम का पहला चरण है। इसके बाद उसकी गतिविधियों और स्वास्थ्य पर लगातार नजर रखी जाएगी। इसके लिए टेलीमेट्री, कैमरा ट्रैप और फील्ड आधारित निगरानी का इस्तेमाल किया जाएगा। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि बाघिन नए वातावरण में किस तरह ढल रही है, उसकी आवाजाही कैसी है और उसका स्वास्थ्य एवं व्यवहार कैसा है।सिर्फ बाघों को छोड़ना नहीं, आत्मनिर्भर आबादी बनाना लक्ष्य
बक्सा में शुरू किए गए इस कार्यक्रम की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जाएगी कि कितने बाघ जंगल में छोड़े गए। असली लक्ष्य समय के साथ ऐसी स्वस्थ, स्वतंत्र रूप से विचरण करने वाली और आत्मनिर्भर बाघ आबादी तैयार करना है, जो प्राकृतिक परिस्थितियों में टिक सके। इसके लिए पर्याप्त और सुरक्षित आवास, शिकार की उपलब्धता, मजबूत सुरक्षा व्यवस्था, आसपास के वन क्षेत्रों के बीच पारिस्थितिक संपर्क, वैज्ञानिक निगरानी और स्थानीय समुदायों की भागीदारी अहम होगी।बक्सा में बाघिन की रिहाई इसी लंबे संरक्षण प्रयास की शुरुआत है। आने वाले वर्षों में इसकी निगरानी से यह तय करने में मदद मिलेगी कि बाघों की आबादी को यहां किस तरह स्थायी रूप से विकसित किया जा सकता है।
