लद्दाख स्थित सियाचिन बेस कैंप (12,000 फीट ऊंचाई) पर रविवार को आए हिमस्खलन में सेना के तीन जवान शहीद हो गए। शहीद होने वालों में दो अग्निवीर भी शामिल हैं। अधिकारियों ने बताया कि हिमस्खलन में जवान फंस गए थे, जिन्हें निकालने के लिए तुरंत बचाव अभियान चलाया गया। सभी के शव बरामद कर लिए गए हैं।सियाचिन दुनिया का सबसे ऊंचा युद्धक्षेत्र माना जाता है। जवान मोहित कुमार, अग्निवीर नीरज कुमार चौधरी और अग्निवीर दभी राकेश देवाभाई एवलांच की वजह से शहीद हो गए।
लद्दाख के सियाचिन ग्लेशियर में बड़े हिमस्खलन में सेना के 3 जवानों की मौत।(फोटो सोर्स: AP)
बर्फ में दबे जवानों को निकालने की चल रही कोशिश
सियाचिन में ऑक्सीजन की कमी, हिमस्खलन और बर्फीले तूफान जवानों के लिए बड़ी आफत हैं। इस इलाके में ज्यादातर समय शून्य से भी 50 डिग्री नीचे तक तापमान रहता है। विशेषज्ञ अवलांच रेस्क्यू टीमें (ART) मौके पर पहुंच चुकी है। बर्फ में दबे जवानों को निकालने की कोशिश चल रही है। सेना के हेलिकॉप्टर, जैसे चीता और Mi-17, घायलों को निकालने और अस्पताल पहुंचाने के लिए इस्तेमाल हो रहे हैं।
सियाचिन में क्यों आते हैं एवलांच
सियाचिन ग्लेशियर, दुनिया का सबसे ऊंचा और कठिन युद्धक्षेत्र कहा जाता है। यह इलाका बार-बार एवलांच की चपेट में आता है। समुद्र तल से 12,000 से 22,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस इलाके में हर साल भारी बर्फबारी होती है। कई बार तो बर्फ की परत 10 मीटर तक मोटी हो जाती है। नई गिरी हुई बर्फ पुराने लेयर पर ठीक से जम नहीं पाती और हल्की सी हलचल या दबाव पड़ते ही नीचे खिसक जाती है। इसी प्रक्रिया को एवलांच कहते हैं।
यहां तैनात सैनिकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ दुश्मन नहीं बल्कि मौसम और प्रकृति का प्रकोप भी है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सियाचिन में गोलीबारी से ज्यादा जवान हिमस्खलन और खराब मौसम की वजह से शहीद हुए हैं।
