देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और मतदाताओं के अधिकारों को और अधिक सशक्त बनाने की दिशा में सर्वोच्च न्यायालय ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि चुनाव में खड़ा उम्मीदवार अगर अपने हलफनामे में कोई गलत जानकारी देता है या झूठ बोलता है, तो कोई भी आम मतदाता अब उसे सीधे अदालत ले जाकर आपराधिक कार्रवाई शुरू करा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125-A के तहत किसी भी प्राइवेट व्यक्ति द्वारा दर्ज शिकायत पूरी तरह से चलने योग्य है और इसके लिए चुनाव आयोग की मंजूरी या नो ऑब्जेक्शन की कोई आवश्यकता नहीं है।
झूठे चुनावी हलफनामे पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
धारा 125-ए और धारा 195(1) की व्याख्या
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने कानून की पेचीदगियों को समझाते हुए सीआरपीसी की धारा 195(1) और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125-ए के बीच के संबंध को स्पष्ट किया। सामान्यतः दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 195(1) के तहत लोक सेवक को गलत जानकारी देने के मामलों (धारा 172 से 188) में जब तक लोक सेवक या संबंधित प्राधिकारी खुद शिकायत न करे, तब तक अदालत संज्ञान नहीं ले सकती। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 125-ए को धारा 195 (CrPC) के दायरे से बाहर रखा गया है। इसलिए, झूठे चुनावी हलफनामे के मामले में कोई भी आम नागरिक या मतदाता सक्षम मजिस्ट्रेट के समक्ष अपनी व्यक्तिगत शिकायत दर्ज करा सकता है और अदालत उस पर संज्ञान लेने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।
कर्नाटक हाईकोर्ट का आदेश खारिज
शीर्ष अदालत ने कर्नाटक उच्च न्यायालय के उस आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि "मतदाता के पास केवल चुनाव याचिका दायर करने का अधिकार है और अपराध की निजी शिकायत दर्ज कराने का अधिकार नहीं है"। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि "लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम में धारा 125-ए को साल 2002 में जोड़ा गया था, जबकि 2006 में सीआरपीसी की धारा 195 में संशोधन किया गया था। अगर विधायिका की यह मंशा होती कि उम्मीदवार द्वारा हलफनामे में झूठी जानकारी देने पर केवल लोक सेवक ही शिकायत दर्ज करा सकता है, तो 2006 के संशोधन में धारा 125-ए को धारा 195 CrPC में शामिल कर दिया गया होता। इसे शामिल न करना संसद का एक सोच-समझकर लिया गया फैसला था।"
'चुनाव आयोग के दिशानिर्देश अदालतों पर बाध्यकारी नहीं'
मामले की सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग (ECI) के उन प्रेस नोट और दिशानिर्देशों का हवाला भी दिया गया, जिनमें आयोग ने कहा था कि वह ऐसे मामलों पर संज्ञान लेकर जांच एजेंसियों को सिफारिश कर सकता है। इस पर तल्ख टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "भले ही चुनाव आयोग अपने क्षेत्र में सर्वोच्च है और अपनी समझ के आधार पर दिशानिर्देश जारी करता है, लेकिन कानूनों की व्याख्या करना प्राथमिक रूप से अदालतों का काम है। चुनाव आयोग के प्रेस नोट या गाइडलाइंस न्यायपालिका पर बाध्यकारी नहीं हैं।"
झूठी और परेशान करने वाली शिकायतों पर क्या बोली कोर्ट?
सुनवाई के दौरान यह आशंका भी जताई गई कि इस व्यवस्था से राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी एक-दूसरे के खिलाफ फर्जी और परेशान करने वाली शिकायतें दर्ज कराने लगेंगे। इस पर पीठ ने आश्वस्त करते हुए कहा कि, देश के कानून मजिस्ट्रेटों को पर्याप्त शक्तियां प्रदान करते हैं। यदि किसी निर्वाचित उम्मीदवार को परेशान करने के लिए दुर्भावनापूर्ण या बेबुनियाद आरोप लगाए जाते हैं, तो सक्षम मजिस्ट्रेट मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के अनुसार उचित आदेश पारित करने में पूरी तरह सक्षम हैं।
