LIVESame-sex marriage verdict Updates: समलैंगिक समुदाय को झटका, सेम-सेक्स की शादी को कानूनी अधिकार देने से SC का इंकार

Same-sex marriage verdict Updates: समलैंगिक समुदाय को झटका, सेम-सेक्स की शादी को कानूनी अधिकार देने से SC का इंकार
Supreme Court Verdict On Same Sex Marriage: समलैंगिक समुदाय को सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने मंगलवार को अपना अहम फैसला सुनाते हुए सेम-सेक्स की शोदी को कानूनी अधिकार देने से इंकार कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने इस समुदाय को सुरक्षा, लाभ एवं सेवाएं देने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों को निर्देश दिया। इस मामले में करीब 10 दिनों की सुनवाई के बाद कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने अपने फैसले में कहा कि केंद्र एवं राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए लैंगिक झुकावों के चलते एलजीबीटीक्यू समुदाय के साथ किसी तरह का भेदभाव न हो। यह समुदाय भी अन्य नागरिकों की तरह हर तरह की सुविधाएं पाने का हकदार है। कोर्ट ने सरकार को एक समिति बनाने का निर्देश दिया है। यह समिति समलैंगिक समुदाय को सुविधाएं देने पर विचार करेगी।
समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने से SC का इंकार
उच्चतम न्यायालय की पांच न्यायाधीशों की पीठ ने समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने से इंकार किया। न्यायमूर्ति हिमा कोहली ने न्यायमूर्ति एस रवींद्र भट्ट के लिखे फैसले से सहमति जताई। न्यायमूर्ति भट्ट ने कहा कि समलैंगिक जोड़ों को बिना किसी बाधा एवं परेशानी के एक साथ रहने का अधिकार है। जस्टिस भट्ट ने प्रधान न्यायाधीश, न्यायमूर्ति कौल की इस बात से सहमति जताई कि संविधान में विवाह के किसी मौलिक अधिकार की गारंटी नहीं दी गई है। उन्होंने कहा कि कानून के अभाव में विवाह का कोई योग्य अधिकार नहीं है। गोद लेने के समलैंगिक जोड़ों के अधिकार पर प्रधान न्यायाधीश से असहमति जताई और कहा कि उन्होंने कुछ चिंताएं व्यक्त की हैं। जस्टिस भट्ट ने कहा कि वह प्रधान न्यायाधीश चंद्रचूड़ के कुछ विचारों से सहमत और कुछ से असहमत हैं।
'CJI के निर्देशों से सहमत नहीं'
जस्टिस रवींद्र भट्ट ने अपने फैसले में कहा कि स्पेशल मैरिज एक्ट पर सीजेआई ने जो निर्देश दिए हैं वह उससे सहमत नहीं हैं।
SC Verdict On Same Sex Marriage: शादी ही अंतिम पड़ाव नहीं-जस्टिस कौल
जस्टिस कौल ने अपना फैसला पढ़ते हुए कहा कि सेम-सेक्स समुदाय को कानूनी मान्यता शादी की समानता की तरफ एक बढ़ा हुआ कदम है। हालांकि, शादी ही अंतिम पड़ाव नहीं है। हमें स्वायत्तता बनाए रखना चाहिए क्योंकि यह दूसरे के अधिकारों का अतिक्रमण नहीं करता। जस्टिस किशन कौल ने कहा कि 'गैर-विपरीत लिंग वाला समुदाय संविधान के तहत सुरक्षा पाने का अधिकारी है।'
'राशन कार्ड में 'परिवार' के रूप में शामिल होंगे समलैंगिक जोड़े'
कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार, राज्य सरकार एवं केंद्र शासित प्रदेश समलैंगिक समुदाय को देश का हिस्सा बनने के अधिकार पर भेदभाव नहीं कर सकतीं। प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि समलैंगिक समुदाय के व्यक्तियों के अधिकारों एवं उनकी पात्रता पर निर्णय करने के लिए केंद्र सरकार एक समिति बनाएगी। यह समिति समलैंगिक जोड़ों को राशन कार्ड में 'परिवार'के रूप में शामिल करने पर विचार करेगी। ग्रेच्युटी, पेंशन से जुड़े अधिकारों एवं संयुक्त बैंक अकाउंट्स में समलैंगिक जोड़े किसी को नामित कर सकें, समिति इसका रास्ता निकालेगी।
सीजेआई ने कहा-CARA उद्देश्य को विफल नहीं कर सकता
अविवाहित जोड़ों को गोद लेने से बाहर नहीं रखा गया है, लेकिन नियम 5 यह कहकर उन्हें रोकता है कि जोड़े को 2 साल तक स्थिर वैवाहिक रिश्ते में रहना होगा। जेजे अधिनियम अविवाहित जोड़ों को गोद लेने से नहीं रोकता है, लेकिन केवल तभी जब CARA इसे नियंत्रित करता है लेकिन यह JJ अधिनियम के उद्देश्य को विफल नहीं कर सकता है।
'समलैंगिकों पर FIR दर्ज करने से पहले पुलिस करे जांच'
प्रधान न्यायाधीश ने केंद्र एनं राज्य सरकारों को समलैंगिक लोगों के अधिकारों के बारे में जागरूक करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने अपने निर्देश में कहा है कि सरकारें समलैंगिक जोड़ों के लिए 'गरिमा गृह' और उनके लिए हॉट लाइन की व्यवस्था करे। सरकार यह भी सुनिश्चित करे कि इंटर-सेक्स बच्चों को ऑपरेशन के लिए बाध्य न किया जाए। समलैंगिक जोड़ों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने से पहले पुलिस को प्रारंभिक जांच करनी चाहिए।
CJI का निर्देश-समलैंगिकों के साथ भेदभाव न हो, सरकारें सुनिश्चित करें
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि कारा सर्कुलर समलैंगिक लोगों को बच्चा गोद लेने का अधिकार नहीं देता। यह संविधान के अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है। सीजेआई ने केंद्र एवं राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि लैंगिक झुकाव के चलते उनके साथ भेदभाव न हो।
लाभ-सेवाओं से समलैंगिकों को वंचित किया जाना मौलिक अधिकार का उल्लंघन
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि विपरीत लिंग वाले व्यक्तियों को भौतिक लाभ एवं सेवाएं देना और इन चीजों से समलैंगिकों को वंचित किया जाना, मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
CJI ने कहा-व्यक्ति का जेंडर और उसकी सेक्सुअलिटी अलग
सीजेआई ने कहा कि समलैंगिक सहित सभी व्यक्तियों को अपने जीवन की नैतिक गुणवत्ता का चयन करने का अधिकार है। व्यक्ति का जेंडर और उसकी सेक्सुअलिटी से अलग है।
SC Verdict On Same Sex Marriage: 'यौनिक झुकाव के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकते'
फैसला पढ़ते हुए सीजेआई ने कहा कि समानता यह कहती है कि किसी व्यक्ति को उसके यौनिक झुकाव के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता।
CJI ने कहा- विधायिका के कार्यक्षेत्र से दूर रहेगा कोर्ट
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि यह कहना गलत है कि शादी एक स्थिर और न बदलने वाली संस्थान है। स्पेशल मैरिज एक्ट को यदि खारिज कर दिया जाए तो देश स्वतंत्रता पूर्व की स्थिति में पहुंच जाएंगा स्पेशल मैरिज एक्ट में बदलाव करना या नहीं, इस पर फैसला संसद को करना है। कोर्ट की यह कोशिश रहेगी कि वह विधायिका के दायरे में प्रवेश न करे।
CJI बोले-मौलिक अधिकारों की सुरक्षा करना हमारा काम
प्रधान न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने कहा कि समलैंगिकता शहरी अवधारणा नहीं है या यह केवल समाज के ऊपरी तबके तक सीमित नहीं है। उन्होंने कहा कि मामले की सुनवाई करते हुए उन्होंने न्यायिक समीक्षा एवं शक्तियों के बंटवारे के संदर्भों को देखा है। सीजेआई ने कहा-शक्तियों के बंटवारे का सिद्धांत का मतलब यह है कि सरकार के तीनों अंग अलग-अलग तरह से काम करते हैं। कोई भी एक इकाई दूसरे के हिस्से का कार्य नहीं कर सकती। भारत सकार ने यह सुझाव दिया कि कोर्ट यदि सूची तय करने का काम करेगी तो इससे शक्तियों के बंटवारे का सिद्धांत का उल्लंघन होगा। हालांकि, शक्तियों के बंटवारे का सिद्धांत न्यायिक समीक्षा की शक्ति को नहीं रोकता। संविधान की मांग है कि कोर्ट नागरिकों के मौलिक सिद्धांतों की सुरक्षा करे। मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए कोर्ट यदि निर्देश जारी करता है तो उसके इस रास्ते में शक्तियों के बंटवारे का सिद्धांत नहीं आता।
फैसले में सहमति और असहमति दोनों-CJI
प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि समलैंगिक शादी पर चार फैसले हैं। उन्होंने कहा कि फैसले में सहमति और असहमति दोनों हैं। संवैधानिक पीठ के फैसले के घटनाक्रम की लाइव स्ट्रीमिंग की जा रही है।
फैसला सुनाने के लिए बैठी संवैधानिक पीठ
समलैंगिक शादी पर अपना फैसला सुनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ बैठ गई है। पीठ अब अपना फैसला पढ़ना शुरू करेगी।
SC Verdict On Same Sex Marriage: 'हम भी संवैधानिक अधिकार चाहते हैं'
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले LGBTQIA+ के कार्यकर्ता हरीश अय्यर ने कहा कि हमें उम्मीद है कि हम जीतेंगे। हमें समान अधिकार मिलेंगे और हम अपनी मर्जी के मुताबिक शादी कर पाएंगे। यह केवल शादी का मामला नहीं है। कोरोना के दौरान ऐसे बहुत सारे लोग थे जो मौत की दहलीज पर खड़े अपने पार्टनर के साथ रहे। लेकिन उन्हें इस बात का कानूनी अधिकार नहीं था कि वे अपने साथी को लाइफ सपोर्ट से हटाने का अधिकार दे सकें। हम भी विपरीत लिंग वाले पुरुषों की तरह संवैधानिक अधिकार चाहते हैं।
बस आने वाला है सुप्रीम कोर्ट का फैसला
SC Verdict On Same Sex Marriage: समलैंगिक शादी के खिलाफ सरकार ने दिया है तर्क
समलैंगिक शादी के विरोध में सरकार, हिंदू और मुस्लिम पक्ष भी हैं। सरकार ने अपनी दलील में कहा कि कानून में पति और पत्नी की जैविक परिभाषा दी गई है। सरकार ने कहा कि समलैंगिक शादी में एक बहुत बड़ी अड़चन यह है कि दोनों में से पति और पत्नी किसे माना जाएगा। यही नहीं सरकार का कहना है कि सेम-सेक्स मैरिज को मान्यता देने पर गोद लेने, तलाक, भरण-पोषण एवं विरासत से जुड़े मुद्दे जटिल होंगे।
याचिकाकर्ताओं की ये हैं दलीलें
याचिकाकर्ताओं ने दुनिया के कई देशों में समलैंगिक शादी को मान्यता मिलने की दलील दी है। उन्होंने कहा है कि भारत में समलैंगिक जोड़ों को कोई भी कानूनी अधिकार नहीं है। उन्होंने बैंक अकाउंट खोलने, पेंशन एवं पीएफ से जुड़े कई सवाल उठाए हैं। याचिकाकर्ता चाहते हैं कि कोर्ट यह स्पष्ट कर दे कि दो लोगों का मतलब केवल स्त्री और पुरुष नहीं बल्कि इसमें समलैंगिक भी शामिल हैं।
SC Verdict On Same Sex Marriage:सेम सेक्स को मान्यता देने वाला डेनमार्क पहला देश
दुनिया के कई देशों में सेम सेक्स मैरिज को कानूनी मान्यता मिली हुई। समलैंगिक शादी को मान्यता देने वाला डेनमार्क दुनिया का पहले देश था। नीदरलेंड ने भी साल 2000 में समलैंगिक शादी को मान्यता दी। इस देश में समलैंगिक जोड़ों को शादी, तलाक और बच्चे गोद लेने का अधिकार मिला।
संवैधानिक पीठ ने की सुनवाई
इससे पहले गत 11 मई को मामले पर सुनवाई पूरी करने के बाद पीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। संवैधानिक पीठ ने इस मामले की सुनवाई गत 18 अप्रैल से शुरू की और यह सुनवाई करीब 10 दिनों तक चली। इस पीठ में प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस एस रवींद्र भट्ट, जस्टिम हीमा कोहली एवं जस्टिस पीएस नरसिम्हा शामिल हैं।