सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी यानी गुरुवार को बिहार में वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को चुनौती देने वाली NGO एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स सहित कई याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने कपिल सिब्बल, अभिषेक सिंघवी, प्रशांत भूषण और गोपाल शंकरनारायण सहित कई वकीलों की दलीलें सुनने के बाद अंतिम सुनवाई पूरी की।
सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)
चुनाव आयोग की ओर से सीनियर वकील राकेश द्विवेदी और मनिंदर सिंह पेश हुए। बेंच ने फैसला सुरक्षित रखने से पहले याचिकाकर्ताओं की ओर से जवाबी दलीलें सुनीं।
कोर्ट ने पिछले साल 12 अगस्त को इस मामले में फाइनल बहस शुरू की थी, जब उसने कहा था कि चुनावी लिस्ट में नामों को शामिल करना या हटाना भारत के चुनाव आयोग (ECI) के संवैधानिक अधिकार क्षेत्र में आता है। ECI ने SIR प्रक्रिया का बचाव करते हुए कहा है कि आधार और वोटर पहचान पत्र को नागरिकता का पक्का सबूत नहीं माना जा सकता।
SIR की विसंगतियों को लेकर विरोध जारी
गौर हो कि SIR की विसंगतियों को लेकर विरोध जारी है। हाल ही में यूपी में मैनपुरी सांसद डिंपल यादव ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में देरी को लेकर जिलाधिकारी को पत्र लिखकर विरोध दर्ज कराया था। डिंपल यादव का आरोप है कि अभियान 10 दिन की देरी से शुरू हुआ और नोटिस जारी करने की गति बेहद धीमी है। दूसरी ओर, सपा सांसद रामगोपाल यादव ने इस पूरी प्रक्रिया को अनावश्यक बताते हुए इसे 'सत्ता बचाने का ड्रामा' करार दिया।
सांसद रामगोपाल यादव ने इस पूरी प्रक्रिया पर कड़ा प्रहार किया
वहीं, समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और सांसद रामगोपाल यादव ने इस पूरी प्रक्रिया पर कड़ा प्रहार किया है। उन्होंने SIR को 'सत्ता में बने रहने का हथकंडा' करार देते हुए कहा कि 2014 से पहले इसकी कोई जरूरत नहीं थी। रामगोपाल ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि यदि लोकतांत्रिक वोटों के बजाय ऐसे 'हथकंडों' से सत्ता हासिल की जाती है, तो देश में नेपाल और बांग्लादेश जैसे हालात पैदा हो सकते हैं।
