सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने की मांग वाली याचिका पर अंतरिम आदेश पारित करने से इनकार कर दिया है।CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिका पर चुनाव आयोग (ECI), मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों अन्य चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी किया है। याचिका में चुनाव आयोग के उन फैसलों को चुनौती दी गई है, जिन्हें याचिकाकर्ता ने एकतरफा तरीके से लिए गए फैसले बताया है।
भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार (फाइल फोटो- PTI)
'चुनाव आयोग को कानून का पालन करना ही होगा'
सुनवाई का सबसे कड़ा संदेश यह रहा कि निर्वाचन आयोग (ECI), अपने संवैधानिक दर्जे के बावजूद, अपनी कार्यप्रणाली को संचालित करने वाले वैधानिक ढांचे से ऊपर नहीं है।
जब याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग के फैसले एकतरफा लिए गए हैं, तो मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने कहा कि अदालत केवल मीडिया रिपोर्टों पर भरोसा करने के बजाय पहले एक आधिकारिक और प्रामाणिक रिकॉर्ड मांगेगी। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा: "एक कानून है, और उनसे उसका पालन करने की उम्मीद की जाती है।" प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी की, "एक अनिवार्य कानून मौजूद है और हम अपेक्षा करते हैं कि वे इसका पालन करें। यदि किसी भी प्रकार का उल्लंघन पाया गया, तो हम उसे निरस्त कर देंगे।"
एक हफ्ते में मांगा जवाब
उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को निर्वाचन आयोग और केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर एक हफ्ते में जवाब मांगा है। यह नोटिस उस याचिका पर भेजा गया है जिसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार की अगुवाई वाले निर्वाचन आयोग के कामकाज के उस तरीके को चुनौती दी गई है, जिसमें कथित तौर पर दो चुनाव आयुक्तों की मंज़ूरी के बिना फैसले लिए गए थे। भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह की दलीलों पर गौर करते हुए नोटिस जारी किया।
याचिकाकर्ता की दलील
यह टिप्पणी याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह की उन दलीलों के बाद आई, जिसमें उन्होंने कहा था कि मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) वैधानिक ढांचे के विपरीत काम कर रहे हैं। सिंह ने अंतरिम राहत पर जोर देते हुए चेतावनी दी, "अदालत को कुछ अंतरिम आदेश पारित करने होंगे, अन्यथा देश में स्थिति बेहद गंभीर हो सकती है।"
पीठ ने संकेत दिया कि यदि रिकॉर्ड से यह साबित होता है कि कानून का पालन नहीं किया गया है, तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है। न्यायमूर्ति बागची ने एक कदम आगे बढ़ते हुए कहा कि यदि रिकॉर्ड दिखाते हैं कि जहां आवश्यकता थी वहां सर्वसम्मति से निर्णय नहीं लिया गया, तो अदालत उस पर रोक लगा सकती है और उसे असंवैधानिक घोषित कर सकती है।
'संशोधित फॉर्म 6 को हमारी मंजूरी नहीं है, यह पूरी तरह स्पष्ट रहे'
अदालत ने नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए उपयोग किए जाने वाले फॉर्म 6 (Form 6) में किए गए बदलावों पर भी गंभीर सवाल उठाए।
CJI ने बेहद सीधे शब्दों में स्पष्टीकरण दिया: "किसी भी संशोधित फॉर्म 6 को हमारी मंजूरी नहीं मिली है। इस बात को पूरी तरह साफ रखा जाए।" पीठ ने कहा कि संबंधित रिकॉर्ड पेश किए जाने के बाद, अदालत यह जानना चाहती है कि इस फॉर्म को किसने संशोधित किया।
