तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नेता अभिषेक बनर्जी (Abhishek Banerjee) के पर्सनल असिस्टेंट (PA) सुमित रॉय की अग्रिम जमानत याचिका पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। कथित सरकारी जमीन घोटाले से जुड़े इस मामले में पश्चिम बंगाल सरकार सुमित रॉय की कस्टोडियल इंटरोगेशन की मांग कर रही है। हालांकि, सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कस्टडी में लेकर पूछताछ की जरूरत पर सवाल उठाए।
पुलिस के सामने TMC सांसद अभिषेक बनर्जी के PA सुमित रॉय (फाइल फोटो- PTI)
CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने मामले की सुनवाई की। सुमित रॉय की ओर से सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायण और राज्य की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए।
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11 दिन तक पूछताछ, फिर भी कस्टडी क्यों?
सुमित रॉय के वकील ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उनके मुवक्किल जांच में लगातार सहयोग कर रहे हैं। वह कई दिनों तक जांच एजेंसी के सामने पेश हुए और करीब 11 दिनों तक पूछताछ हुई। वकील ने दावा किया कि इतनी लंबी पूछताछ के बावजूद सुमित रॉय से उस मुख्य अपराध के संबंध में सीधे सवाल नहीं पूछे गए, जो उनके खिलाफ लगाया जा रहा है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि पूरी पूछताछ की वीडियो रिकॉर्डिंग की गई है और अगर रिकॉर्डिंग देखी जाए तो यह साफ हो जाएगा कि जांच के दौरान उनसे किस तरह के सवाल पूछे गए।
सुप्रीम कोर्ट ने पूछताछ की वीडियो रिकॉर्डिंग मांगी
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने निर्देश दिया कि सुमित रॉय से हुई पूछताछ की वीडियो रिकॉर्डिंग को रिकॉर्ड पर रखा जाए। यह निर्देश इसलिए अहम है क्योंकि राज्य की ओर से कस्टोडियल इंटरोगेशन की जरूरत बताई जा रही है, जबकि आरोपी का कहना है कि वह पहले ही जांच में शामिल हो रहा है और उससे लंबी पूछताछ की जा चुकी है।
राज्य बोला- जांच में अभी बहुत कुछ सामने आना बाकी
राज्य की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कस्टोडियल इंटरोगेशन की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने जांच में सामने आए वित्तीय लेन-देन और दूसरे दस्तावेजों का हवाला दिया। राज्य का कहना है कि जांच में सामने आई जानकारी 'आइसबर्ग की सिर्फ ऊपरी सतह' है और अभी काफी कुछ सामने आना बाकी है। राज्य ने कोर्ट के सामने जांच से जुड़े कुछ दस्तावेज पहले ही सीलबंद लिफाफे में रखे थे।
'10 लाख रुपये का केस'
सुमित रॉय के वकील ने राज्य की दलीलों का विरोध किया। उन्होंने कहा कि उनके मुवक्किल के खिलाफ जिस लेन-देन की बात की जा रही है, वह करीब 10 लाख रुपये का एक लेन-देन है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जिन दस्तावेजों पर सुमित रॉय के हस्ताक्षर होने की बात कही जा रही है, वास्तव में ऐसे दस्तावेज मौजूद हैं या नहीं। वकील ने यह भी कहा कि सुमित रॉय को FIR में नामजद नहीं किया गया था और जांच के दौरान उनका नाम सामने आया।
'पूछताछ में सहयोग कर रहे हैं'
सुमित रॉय की ओर से यह भी दलील दी गई कि वह जांच एजेंसी के सामने नियमित रूप से पेश हो रहे हैं। उनका कहना है कि जांच में शामिल होना और हर सवाल का जवाब देना दो अलग बातें हैं। इससे पहले सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से यह आरोप लगाया गया था कि रॉय जांच में सहयोग नहीं कर रहे और सवालों से बच रहे हैं। उनके वकील ने इसके जवाब में संविधान के तहत चुप रहने के अधिकार का हवाला दिया था।
पहले सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी पर लगाई थी रोक
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही सुमित रॉय की गिरफ्तारी पर रोक लगा चुका है। 6 अगस्त को कोर्ट ने उन्हें जांच में पूरी तरह सहयोग करने का निर्देश देते हुए गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा दी थी।
कोर्ट ने कहा था कि उन्हें सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे के बीच जांच के लिए उपलब्ध रहना होगा और पूछताछ के दौरान उनके साथ कोई वकील या अन्य व्यक्ति नहीं होगा। इससे पहले कलकत्ता हाई कोर्ट ने 3 अगस्त को सुमित रॉय की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी। हाई कोर्ट ने उस समय जांच के इस चरण में कस्टोडियल इंटरोगेशन की संभावना से इनकार नहीं किया था।
सुप्रीम कोर्ट क्यों पहुंचा है ये मामला?
यह मामला पश्चिम बंगाल के सल्बोनी में कथित सरकारी जमीन की हेराफेरी और कब्जे से जुड़ा है। आरोप है कि सरकारी जमीन को कम कीमत पर खरीदारों को बेचने के लिए फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया। जांच में धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात, जालसाजी, फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल और आपराधिक साजिश से जुड़ी धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है।
सुमित रॉय का पक्ष है कि उनका इस जमीन के लेन-देन से कोई संबंध नहीं है और उन्हें अभिषेक बनर्जी के साथ उनके राजनीतिक संबंधों की वजह से मामले में घसीटा गया है।
