सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (18 मार्च) को I-PAC रेड मामले में पश्चिम बंगाल सरकार की तरफ से पेश वकीलों से कहा कि वे यह 'तय नहीं कर सकते' कि किसी मामले की सुनवाई कब होगी। यह टिप्पणी प्रवर्तन निदेशालय (ED) की ओर से दायर एक याचिका की सुनवाई के दौरान की गई। इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्य के अधिकारियों ने राजनीतिक कंसल्टेंसी फर्म I-PAC से जुड़ी जांच में दखल दिया है। मनी लॉन्ड्रिंग की जांच के सिलसिले में 8 जनवरी को राजनीतिक कंसल्टेंसी फर्म I-PAC के दफ्तर पर छापे मारे गए थे।
SC ने ममता सरकार को फटकारा (AI Image)
बंगाल सरकार ने ED के जवाबी हलफनामे पर जवाब देने के लिए और समय मांगा। वरिष्ठ वकील श्याम दीवान ने दलील दी कि एजेंसी ने कुछ नए आरोप लगाए हैं, जिनके लिए विस्तृत जवाब की ज़रूरत है। वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने भी इस अनुरोध का समर्थन करते हुए कहा कि राज्य सरकार को इन नए दावों पर जवाब देने की अनुमति दी जानी चाहिए।
'इस मामले को जान-बूझकर लटकाया जा रहा है'
ED की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस याचिका का विरोध करते हुए इसे मामले में देरी करने की एक चाल बताया। उन्होंने इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि हलफनामा 19 फरवरी को ही दाखिल कर दिया गया था और कहा कि इस मामले को जान-बूझकर लटकाया जा रहा है। उन्होंने इसे 'चौंकाने वाला' भी बताया कि कोई मुख्यमंत्री किसी केंद्रीय एजेंसी द्वारा की जा रही जांच में दखल दे।
यह मामला राज्य में होने वाले स्थानीय विधानसभा चुनावों से पहले, केंद्रीय जांच एजेंसियों और TMC-शासित पश्चिम बंगाल सरकार के बीच चल रही खींचतान में एक बड़ा टकराव बिंदु बन गया है।
सत्ता का 'घोर दुरुपयोग'
ED ने आरोप लगाया है कि ममता बनर्जी अपनी Z-प्लस सुरक्षा के साथ छापेमारी के दौरान I-PAC के दफ़्तर में 'अवैध रूप से घुस गईं' और कार्यवाही में दखल दिया; उन्होंने परिसर से कुछ सामग्री भी निकाल ली, जिसे ED ने सत्ता का 'घोर और खुला दुरुपयोग' करार दिया है।
किसी दिन कोई दूसरा मुख्यमंत्री किसी दूसरे दफ़्तर में घुस सकता है तब...?'
इस पर टिप्पणी करते हुए SC बेंच ने कहा, 'यहां एक ऐसी स्थिति है जहां उनके (ED के) अनुसार, एक CM असामान्य रूप से उस जगह घुस जाते हैं जहाँ पूरी तरह से बेरोकटोक जांच चल रही होती है... ऐसी स्थिति में आप कहते हैं कि वे (ED) न तो Art 32 (SC) के तहत कार्रवाई कर सकते हैं और न ही Art 226 (HC) के तहत... यह कोई सुखद स्थिति नहीं है; हम मुद्दों पर तब फ़ैसला करते हैं जब कोई नई स्थिति सामने आती है। किसी दिन कोई दूसरा मुख्यमंत्री किसी दूसरे दफ़्तर में घुस सकता है... तब फ़ैसला कौन करेगा?'
