प्रेसिडेंशियल रेफरेंस को लेकर केंद्र सरकार की सुप्रीम कोर्ट में दलील, कहा- पैदा होगी संवैधानिक अव्यवस्था

Supreme Court: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा भेजे गए राष्ट्रपति संदर्भ में यह सवाल उठाया गया है कि क्या राज्यपाल और राष्ट्रपति को राज्य विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए निश्चित समय सीमा में बांधा जा सकता है।

Presidential Reference: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा भेजे गए राष्ट्रपति संदर्भ में यह सवाल उठाया गया है कि क्या राज्यपाल और राष्ट्रपति को राज्य विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए निश्चित समय सीमा में बांधा जा सकता है। इस पर केंद्र सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी लिखित दलीलें दाखिल की हैं। केंद्र सरकार ने साफ तौर पर कहा है कि यदि अदालत राष्ट्रपति और राज्यपालों पर ऐसी समय सीमा थोपती है तो यह शक्तियों के नाजुक संतुलन(sepration of power) को बिगाड़ देगा और देश में संवैधानिक अव्यवस्था की स्थिति पैदा हो जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट

प्रेसिडेंशियल रेफरेंस को लेकर केंद्र सरकार की सुप्रीम कोर्ट में दलील

एसजी तुषार मेहता के जरिए जो दलीलें दी गई हैं उसमें कहा गया है कि राज्यपाल और राष्ट्रपति को संविधान ने जो विवेकाधिकार की शक्तियां दी हैं, उसे सीमित करना न्यायपालिका द्वारा कार्यपालिका और विधायिका के अधिकारों में दखल होगा। सरकार का तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट या राज्यों के हाईकोर्ट इस तरह का आदेश देकर उन शक्तियों का इस्तेमाल करने लगेंगे संविधान ने उन्हें दिया ही नहीं है। केंद्र ने अदालत को आगाह भी किया है कि इस समय सीमा तय करने से न केवल लोकतांत्रिक प्रक्रिया में जटिलता आएगी बल्कि यह सरकार और शासन की कार्यप्रणाली को भी असंतुलित करेगा। सरकार ने कहा कि राष्ट्रपति और राज्यपालों की भूमिका संविधान के मूल उद्देश्यों की पूर्ति के लिए लचीली होनी चाहिए न कि इसको किसी समय सीमा में बांधना चाहिए। इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ 19 अगस्त से शुरू करेगी।

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