राज्यसभा से सेवानिवृत्त हो रहे सांसदों के लिए आयोजित विदाई समारोह इस बार केवल औपचारिकता नहीं रहा, बल्कि लोकतांत्रिक परंपराओं और राजनीतिक मूल्यों की गहराई को दर्शाने वाला अवसर बन गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि राजनीति में पूर्णविराम जैसा कुछ नहीं होता—भूमिकाएं बदलती हैं, लेकिन जनसेवा का संकल्प हमेशा कायम रहता है।
राज्यसभा में सांसदों की विदाई
अनुभवी नेताओं को बताया लोकतंत्र की धरोहर
प्रधानमंत्री ने वरिष्ठ नेताओं जैसे एच डी देवेगौड़ा, मल्लिकार्जुन खरगे, और शरद पवार का विशेष उल्लेख करते हुए उन्हें भारतीय संसदीय लोकतंत्र की संस्थागत स्मृति बताया। उन्होंने कहा कि दशकों का उनका अनुभव नई पीढ़ी के सांसदों के लिए मार्गदर्शक है और उनसे राजनीतिक अनुशासन व मर्यादा सीखने की आवश्यकता है।
संसद को बताया “ओपन यूनिवर्सिटी”
अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने संसद, विशेषकर राज्यसभा को एक ओपन यूनिवर्सिटी की संज्ञा दी। उन्होंने कहा कि यह केवल कानून बनाने का मंच नहीं, बल्कि विचारों के आदान-प्रदान, नीति-निर्माण की समझ और राजनीतिक परिपक्वता विकसित करने का केंद्र भी है। यहां अनुभव और नई ऊर्जा का संतुलन लोकतंत्र को मजबूती देता है।
पुराने और नए संसद भवन का अनुभव अहम
पीएम मोदी ने उन सांसदों की सराहना की जिन्हें पुराने और नए दोनों संसद भवनों में काम करने का अवसर मिला। उन्होंने इसे भारतीय लोकतंत्र के संक्रमण और विकास का जीवंत अनुभव बताया, जो उनके सार्वजनिक जीवन की महत्वपूर्ण पूंजी रहेगा।
उपसभापति की भूमिका की सराहना
प्रधानमंत्री ने राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह की कार्यशैली की प्रशंसा करते हुए कहा कि उन्होंने सदन में संतुलन, संवाद और सहमति की संस्कृति को मजबूत किया है। उनकी निष्पक्षता और संयम ने संसदीय गरिमा को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई।
विदाई अंत नहीं, नई शुरुआत
अपने संबोधन के अंत में प्रधानमंत्री ने विदा ले रहे सांसदों को संदेश दिया कि संसद से विदाई उनके सार्वजनिक जीवन का अंत नहीं है, बल्कि जनसेवा के नए अध्याय की शुरुआत है। उन्होंने विश्वास जताया कि ये सभी नेता अपने अनुभव और जनसंपर्क के जरिए आगे भी देश के लोकतांत्रिक जीवन में सक्रिय योगदान देते रहेंगे।
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