PM Modi in Ayodhya: पीएम मोदी दिवाली की पूर्व संध्या यानि कि छोटी दिवाली के अवसर पर अयोध्या में हैं। इस दौरान उन्होंने दीपोत्सव कार्यक्रम में भाग लिया। अयोध्या पहुंचने के बाद पीएम मोदी ने भगवाम राम की पूजा-अर्चना की और राम मंदिर के निर्माण कार्य का निरीक्षण भी किया।
इसके बाद पीएम मोदी ने एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि अयोध्या के डीएनए में भगवान राम हैं। भगवान राम किसी को नहीं छोड़ते हैं। अमृतकाल में भगवान राम जैसी संकल्प शक्ति है। वहीं दीपोत्सव कार्यक्रम को शुरू करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि आज अयोध्या जी, दीपों से दिव्य हैं, भावनाओं से भव्य हैं, आज अयोध्या नगरी, भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण के स्वर्णिम अध्याय का प्रतिबिंब है।
श्री रामलला विराजमान के दरबार में भारतीय संस्कृति के संवाहक।जय श्री राम! t.co/Jb0vTw82lF
— ANI (@ANI) Oct 23, 2022
पीएम मोदी ने अपने संबोधन में कहा- "श्री रामलला के दर्शन और उसके बाद राजा राम का अभिषेक, ये सौभाग्य रामजी की कृपा से ही मिलता है। जब श्रीराम का अभिषेक होता है तो हमारे भीतर भगवान राम के आदर्श, मूल्य और दृढ़ हो जाते हैं। आजादी के अमृतकाल में भगवान राम जैसी संकल्प शक्ति, देश को नई ऊंचाई पर ले जाएगी। भगवान राम ने अपने वचन में, अपने विचारों में, अपने शासन में, अपने प्रशासन में जिन मूल्यों को गढ़ा, वो सबका साथ-सबका विकास की प्रेरणा हैं और सबका विश्वास-सबका प्रयास का आधार हैं।"
पीएम श्री @narendramodi प्रभु राम की नगरी अयोध्या में सरयू घाट पर संध्या आरती में भाग लेते हुए। t.co/xviiwqHWQp
— ANI (@ANI) Oct 23, 2022
आगे पीएम मोदी ने कहा कि आज हमें उस संकल्प को दोहराना है जो हमने लाल किले से लिया था। उन्होंने कहा- "लाल किले से मैंने सभी देशवासियों से पंच प्राणों को आत्मसात करने का आह्वान किया है। इन पंच प्राणों की ऊर्जा जिस एक तत्व से जुड़ी है, वो है भारत के नागरिकों का कर्तव्य। आज अयोध्या नगरी में, दीपोत्सव के इस पावन अवसर पर हमें अपने इस संकल्प को दोहराना है, श्रीराम से सीखना है।"
पीएम मोदी ने आगे भगवान राम को लेकर कहा कि भगवान राम, मर्यादापुरुषोत्तम कहे जाते हैं। मर्यादा, मान रखना भी सिखाती है और मान देना भी और मर्यादा, जिस बोध की आग्रह होती है, वो बोध कर्तव्य ही है। राम किसी को पीछे नहीं छोड़ते। राम कर्तव्य-भावना से मुख नहीं मोड़ते। इसलिए, राम, भारत की उस भावना के प्रतीक हैं, जो मानती है कि हमारे अधिकार हमारे कर्तव्यों से स्वयं सिद्ध हो जाते हैं।
