करीब 15 साल पहले डीजीसीए के जिस आदेश ने एक अनुभवी पायलट के करियर पर ब्रेक लगा दिया था, उसे अब बॉम्बे हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया है। अदालत ने 62 वर्षीय एक पायलट को राहत देते हुए नागर विमानन महानिदेशालय (डीजीसीए) के उस फैसले को 'अवैध और कानूनी रूप से असंगत' करार दिया, जिसके तहत साल 2011 में पायलट जीतेंद्र कृष्ण वर्मा का एयरलाइन ट्रांसपोर्ट पायलट लाइसेंस (एटीपीएल) निलंबित कर दिया गया था।
बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला
फैसला देते हुए न्यायमूर्ति मनीष पितले और न्यायमूर्ति श्रीराम शिरसाट की पीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति का लाइसेंस निलंबित करने से पहले उसे अपना पक्ष रखने का अवसर देना जरूरी है। लेकिन वर्मा के मामले में न तो कोई कारण बताओ नोटिस जारी किया गया और न ही उन्हें सुनवाई का मौका दिया गया। अदालत ने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन माना।
अदालत ने कहा कि हमें लगता है कि याचिकाकर्ता (वर्मा) के साथ निश्चित रूप से अन्याय हुआ है, क्योंकि वह अपना पक्ष नहीं रख सके। इसलिए हम लाइसेंस निलंबन के आदेश को रद्द करते हैं और मामले को डीजीसीए के पास वापस भेजते हैं ताकि याचिकाकर्ता को सुनवाई का अवसर दिया जा सके, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप होगा। पीठ ने यह भी उल्लेख किया कि 2011 में प्राथमिकी दर्ज होने और आरोपपत्र दाखिल किए जाने के बावजूद आज तक वर्मा के खिलाफ आरोप तय नहीं किए गए हैं। उच्च न्यायालय ने कहा यह आदेश (लाइसेंस निलंबन) अवैध और कानूनी रूप से असंगत है, इसलिए इसे रद्द किया जाता है। याचिकाकर्ता को जारी किया गया एटीपीएल लाइसेंस बहाल किया जाता है।
गौरतलब है कि डीजीसीए ने 12 मार्च 2011 को जीतेंद्र कृष्ण वर्मा के एयरलाइन ट्रांसपोर्ट पायलट लाइसेंस (एटीपीएल) को निलंबित कर दिया था। एटीपीएल पायलट लाइसेंस का सर्वोच्च स्तर माना जाता है। यह कार्रवाई दिल्ली में उनके खिलाफ दर्ज एक प्राथमिकी के बाद की गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उन्होंने जाली दस्तावेजों के आधार पर यह लाइसेंस हासिल किया था। उस समय जीतेंद्र कृष्ण वर्मा 46 वर्ष के थे और उन्होंने विमान नियमों के तहत अपने लाइसेंस के निलंबन को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय का रुख किया था।
वर्मा की याचिका के अनुसार, उन्हें दिसंबर 1988 में कमर्शियल पायलट लाइसेंस जारी किया गया था, जिसका समय-समय पर नवीनीकरण होता रहा। वह एअर इंडिया में कार्यरत थे और नियमित रूप से उड़ानों का संचालन करते थे। वर्ष 2010 में वह एयरलाइन ट्रांसपोर्ट पायलट लाइसेंस (एटीपीएल) पाने के पात्र हो गए। आवश्यक परीक्षा पास करने के बाद उन्हें यह लाइसेंस जारी कर दिया गया। मार्च 2011 में दिल्ली में एक शिकायत दर्ज कराई गई, जिसमें आरोप लगाया गया कि वर्मा ने जाली दस्तावेजों के आधार पर एटीपीएल प्राप्त किया है। उसी महीने उन्हें गिरफ्तार किया गया, लेकिन बाद में जमानत मिल गई। प्राथमिकी दर्ज होने के बाद डीजीसीए ने उनका लाइसेंस निलंबित कर दिया।
डीजीसीए का तर्क था कि वर्मा ने जाली दस्तावेजों के आधार पर एटीपीएल हासिल किया था और जन सुरक्षा के हित में उनका लाइसेंस निलंबित किया गया। वर्मा ने अपनी याचिका में कहा कि डीजीसीए ने लाइसेंस निलंबित करने से पहले न तो उन्हें कारण बताओ नोटिस दिया और न ही अपना पक्ष रखने का अवसर प्रदान किया। उन्होंने कहा कि यह नियमों के विपरीत था।
वर्मा के अनुसार, लाइसेंस निलंबित होने के बाद उनकी नौकरी भी समाप्त कर दी गई थी। उन्होंने सेवा समाप्ति आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। फरवरी 2019 में उच्च न्यायालय ने उनकी बर्खास्तगी का आदेश रद्द कर दिया था।
