Jharkhand: तो क्या झारखंड में राजनीतिक तूफान आने से पहले की है ये खामोशी! क्या होगा इस रस्साकशी का अंजाम?

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  • Updated Oct 23, 2022, 03:11 PM IST

राज्यपाल बीते महीनों में राज्य सरकार की ओर से विधानसभा में पारित एंटी मॉब लिंचिंग बिल, कृषि मंडी बिल सहित आधा दर्जन बिल अलग-अलग वजहों से लौटा चुके हैं। हाल में उन्होंने सरकार की ओर से कोर्ट फीस वृद्धि को लेकर पारित विधेयक को भी पुनर्विचार के लिए लौटाया है।

Ranchi: तकरीबन 22 साल 11 महीने पहले राज्य के तौर पर अस्तित्व में आए झारखंड (Jharkhand) में अब तक दस राज्यपाल (Governor) नियुक्त हुए हैं। इनमें से वर्ष 2004 से 2009 के बीच राज्यपाल रहे सैयद सिब्ते रजी और अब दसवें राज्यपाल के रूप में कार्यरत रमेश बैस (Ramesh Bais) का कार्यकाल राजनीतिक विवादों के लिए याद किया जाएगा। पूर्व राज्यपाल सैयद सिब्ते रजी की भूमिका पर वर्ष 2005 में उस वक्त तीव्र विवाद खड़ा हुआ था, जब उन्होंने विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद सबसे बड़ी पार्टी BJP के नेता के बजाय यूपीए के लीडर शिबू सोरेन (Shibu Soren) को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी। बहुमत साबित न कर पाने के कारण नौ दिनों बाद ही उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था और तब अर्जुन मुंडा (Arjun Munda) ने सीएम पद की शपथ ली थी।

Jharkhand Political Crisis

झारखंड के राज्यपाल के फैसले पर अटकी सबकी नजर

हेमंत सोरेन की कुर्सी पर खतरा!

मौजूदा राज्यपाल रमेश बैस का कार्यकाल 7 जुलाई 2021 से शुरू हुआ है। इनके अब तक के लगभग सवा वर्षों के कार्यकाल में राजभवन और राज्य सरकार के बीच कम से कम तीन-चार मौकों पर मतभेद-तनाव और असहमति की खबरें सामने आ चुकी हैं।बीते दो महीने से राज्य में भारत के निर्वाचन आयोग की एक चिट्ठी को लेकर सियासी रस्साकशी चल रही है। इसमें एक सिरे पर राज्यपाल रमेश बैस हैं तो दूसरे सिरे पर राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन। यह सीलबंद चिट्ठी बीते 25 अगस्त को नई दिल्ली से रांची स्थित राजभवन पहुंची। चुनाव आयोग की यह चिट्ठी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन (Hemant Soren) की योग्यता-अयोग्यता तय किये जाने के संबंध में है, लेकिन 59 दिन बाद भी इसका आधिकारिक तौर पर खुलासा नहीं हुआ है कि इस चिट्ठी का मजमून क्या है? मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और राज्य के सत्ताधारी गठबंधन का आरोप है कि इस चिट्ठी का खुलासा न किये जाने से राज्य में राजनीतिक अनिश्चितता और भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है। दूसरी तरफ राज्यपाल ने सार्वजनिक तौर पर कह दिया है कि यह उनका अधिकार क्षेत्र है कि वह इस चिट्ठी पर कब और क्या निर्णय लेंगे? इसपर किसी को सवाल नहीं उठाना चाहिए।

जानिए मामला

यह चिट्ठी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के ऑफिस ऑफ प्रॉफिट और जन प्रतिनिधित्व कानून के कथित तौर पर उल्लंघन से जुड़े केस से संबंधित है। मामला यह है कि हेमंत सोरेन ने मुख्यमंत्री रहते हुए रांची के अनगड़ा में अपने नाम 88 डिसमिल के क्षेत्रफल वाली पत्थर खदान लीज पर ली थी। हालांकि इस खदान में खनन का कोई काम नहीं हुआ और बाद में सोरेन ने इस लीज को सरेंडर कर दिया। भाजपा ने इसे ऑफिस ऑफ प्रॉफिट (लाभ का पद) और जन प्रतिनिधित्व कानून के उल्लंघन का मामला बताते हुए राज्यपाल के पास शिकायत की थी। राज्यपाल ने इसपर चुनाव आयोग से मंतव्य मांगा था। आयोग ने शिकायतकर्ता और हेमंत सोरेन को नोटिस जारी कर इस मामले में उनसे जवाब मांगा। दोनों के पक्ष सुनने के बाद चुनाव आयोग ने बीते 25 अगस्त को राजभवन को सीलबंद लिफाफे में अपना मंतव्य भेज दिया था।

इसे लेकर अनऑफिशियली ऐसी खबरें तैरती रहीं कि चुनाव आयोग ने हेमंत सोरेन को दोषी मानते हुए उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द करने की सिफारिश की है और इस वजह से उनकी मुख्यमंत्री की कुर्सी जानी तय है। ऐसी खबरों से राज्य में बने सियासी सस्पेंस और भ्रम के बीच सत्तारूढ़ गठबंधन को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के प्रति एकजुटता जताने के लिए डिनर डिप्लोमेसी और रिजॉर्ट प्रवास तक के उपक्रमों से गुजरना पड़ा। इतना ही नहीं, विधानसभा के विशेष सत्र में सत्तारूढ़ गठबंधन ने उनके पक्ष में विश्वास मत का प्रस्ताव तक पारित किया।

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