Lok Sabha Elections 2024: चुनावों से पहले अपने ढांचे में नई जान फूंकने के लिए एक ओर जहां एनडीए ने महामंथन कर 38 दलों को अपने साथ लिया। वहीं, विपक्षी खेमे में 26 दल और यूपीए को इंडिया के रूप में नई पहचान मिल गई। ऐसे में कुल 64 सियासी दल गठबंधनों की छाया तले आए, मगर कुछ पार्टियां ऐसी भी थीं, जिन्होंने विभिन्न कारणों के चलते खुद को न सिर्फ स्वतंत्र रखना ठीक समझा बल्कि इन गठजोड़ों से दूरी भी बनाए रखी। ऐसे दलों में मायावती की बसपा से लेकर बादल परिवार का शिअद और असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम शामिल हैं। आइए, जानतें हैं ऐसी ही पार्टियों के बारे में:
तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (क्रिएटिवः प्रिंस डोगरा)
जनता दल (सेक्यूलर)
कर्नाटक का यह दल (पूर्व पीएम एचडी देवगौड़ा के नेतृत्व वाला) कांग्रेस और बीजेपी के गठबंधनों का हिस्सा रहा है, पर मंगलवार को सियासी तस्वीर में यह कहीं न नजर आया। वैसे, देखा जाए तो यह खुद को कांग्रेस और लेफ्ट के नजदीक पाता है, जबकि इसे मुसलमानों का समर्थन भी मिलता रहा है। यही वजह है कि ऐसा माना जाता है कि उसका भाजपा के साथ कोई खासा तालमेल नहीं है। हालांकि, साल 2006 में जेडी(एस) सत्ता में आने के लिए बीजेपी के साथ गठजोड़ का हिस्सा बना था। वैसे, कर्नाटक के सीएम और जेडी(एस) नेता एचडी कुमारस्वामी ने इस हफ्ते संकेत दिए थे कि वे लोग किसके साथ जाएंगे...यह कहना फिलहाल जल्दबाजी होगी, मगर पार्टी उसी के साथ जाएगाी, जिसके आम चुनाव जीतने की संभावना अधिक होगी।शिरोमणि अकाली दल
सुखबीर सिंह बादल की इस पार्टी को लेकर यह अटकल थी कि बीजेपी उसे अपने पाले में जाने के लिए लुभा लेगी, मगर 18 जुलाई 2023 को वह एनडीए की बैठक से दूर रही। साथ ही विपक्ष की बैठक में उसने हिस्सा लेना जरूरी न समझा। अंग्रेजी अखबार दि इंडियन एक्सप्रेस को पार्टी सूत्रों ने बताया कि शिअद किसी भी सूरत में पंजाब में अपने विरोधियों के साथ सीट शेयरिंग के मंच का सामना नहीं करना चाहती है। यही वजह है कि उसने विपक्ष की मीटिंग में हिस्सा नहीं लिया। वैसे, कृषि कानूनों को लेकर शिअद के सितंबर 2020 में बीजेपी के साथ रिश्ते खराब हो गए थे। बीजेपी ने कहा है कि वह 2024 में पंजाब की सभी 13 लोकसभा सीटों पर अकेली लड़ेगी।बहुजन समाज पार्टी
मायावती की लीडरशिप वाली बसपा कभी भी एनडीए का हिस्सा नहीं रही है। वह हमेशा से बीजेपी की कटु आलोचक रही है, पर इसका मतलब यह नहीं है कि वह विपक्ष की तरफ है। बसपा ने साफ किया था कि वह किसी के पाले में नहीं जाएगी और न ही उसे किसी की ओर से न्यौता मिला है।बीजू जनता दल
नवीन पटनायक के नेतृत्व वाला बीजद 25 साल से ओडिशा की सत्ता में रहा है। पूर्व में वहां के सीएम और बीजद प्रमुख पटनायक का पीएम नरेंद्र मोदी के साथ अच्छा कनेक्शन और बॉन्ड रहा है, जबकि वह बीजेपी की नीतियों का समर्थन भी करते रहे हैं। 2019 में बीजद ने बीजेपी के लिए राज्यसभा की एक सीट छोड़ दी थी, जहां से ब्यूरोक्रेट से नेता बने अश्विनी वैष्णव को उतारा गया था। हालांकि, मौजूदा समय में बीजेपी बीजद की मुख्य विरोधी पार्टी है और वह कोई भी फैसला जल्दबाजी में लेने से पटनायक को रोकेगी।भारत राष्ट्र समिति
तेलंगाना सीएम के चंद्रशेखर राव यानी केसीआर की विपक्षी मोर्चे की बैठक में गैर-मौजूदगी कोई चौकाने वाली नहीं है। दरअसल, इस साल सूबे में चुनाव हैं और वहां पर कांग्रेस उसकी मूल प्रतिद्वंदी है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी पहले ही कह चुके हैं कि केसीआर उस बैठक का हिस्सा नहीं होंगे। राहुल ने उन पर बीजेपी की बी टीम होने का आरोप लगाया था। हाल ही में मोदी ने केसीआर पर भ्रष्टाचार में लिप्त होने और परिवारवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया था। वैसे, केसीआर भी बीजेपी की केंद्रीय नीतियों के खिलाफ अपना स्पष्ट रुख लेते नजर आए हैं।वाईएसआरसीपी
आंध्र प्रदेश के सीएम वाई एस जगन मोहन रेड्डी नीत वाईएसआरसीपी ने राज्य स्तर पर बीजेपी से दूरी बना कर रखी है, जबकि केंद्र स्तर पर उसका रिश्ता भगवा दल से सौहार्दपूर्ण रहा है। बीजेपी की नीतियों के समर्थन से ऐसे कई दफा संकेत गए हैं कि वह एनडीए की ओर है, पर असल में ऐसा नहीं है। जहां तक विपक्षी खेमे की बात है तब जगन के लिए सबसी बड़ी समस्या कांग्रेस ही रहेगी। दरअसल, उन्होंने नवंबर 2010 में पार्टी से इस्तीफा (पिता वाईएस राजशेखर रेड्डी की मौत के बाद सीएम पद न दिए जाने को लेकर) दे दिया था।इंडियन नेशनल लोक दल
1998 से 2004 तक आईएनएलडी एनडीए का हिस्सा रही है। आगे 2009 में वह फिर एनडीए का हिस्सा बनी, पर अपने गृह राज्य हरियाणा में एक भी लोकसभा सीट न जीत सकी। मंगलवार को जननायक जनता पार्टी (इनेलो की शाखा और राज्य सरकार में भाजपा की सहयोगी) एनडीए की बैठक में थी, पर दूसरी ओर आईएनएलडी हरियाणा में बीजेपी और कांग्रेस के खिलाफ तीसरा मोर्चा बनाने का दावा करती है।ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन
असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व वाली एआईएमआईएम भी दोनों ही बैठकों से गायब रही। वह अपनी पार्टी के इकलौते सांसद हैं, जबकि सूबे की विधानसभा में उनके सात विधायक हैं। सूबे के बाहर वह महाराष्ट्र, बिहार और यूपी समेत सूबों में अपने प्रसार के लिए किस्मत आजमा रही है, जबकि वह कांग्रेस के साथ पूर्व में गठबंधन में रह चुकी है। हालांकि, यह दल बीजेपी और कांग्रेस दोनों पर ही सियासी निशाना भी साध चुका है। कांग्रेस जहां एआईएमआईएम को बीजेपी की बी पार्टी करार दे रही है, वहीं बीजेपी के द्वार उसके लिए बंद हैं।ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट
एआईयूडीएफ को भले ही एनडीए की बैठक के लिए न्यौता न भेजा गया हो, मगर नॉर्थ ईस्ट के असम में बड़े स्तर पर मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने वाली यह पार्टी लंबे समय से बीजेपी और उसकी नीतियों की आलोचना करती रही है। हालांकि, एआईयूडीएफ को विपक्ष की मीटिंग में भी नहीं बुलाया गया। ऐसा संभवतः उसके कांग्रेस से होने वाले संबंधों के चलते हो सकता है। दोनों पार्टियों ने साल 2021 में असम का विधानसभा चुनाव साथ मिलकर लड़ा था, पर उसके बाद से दोनों के रिश्ते तनावपूर्ण रहे हैं। वैसे, पूर्व में कांग्रेस के सीनियर नेता जयराम रमेश ने एआईयूडीएफ के नेता बदरुद्दीन अजमल को बीजेपी का माउथपीस करार दिया था। उन्होंने कहा था कि उनका यूपीए से कोई लेना देना नहीं है।
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