CJI Surya Kant: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने जोर देकर कहा है कि न्याय प्रणाली को आधुनिक तकनीक के माध्यम से अधिक सुलभ, कुशल और उत्तरदायी बनाया जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि डिजिटल नवाचार (डिजिटल इनोवेशन) को न्यायिक ज्ञान और मानवीय निर्णय क्षमता का पूरक होना चाहिए, न कि उसका विकल्प। रांची में झारखंड उच्च न्यायालय के नए डेटा सेंटर के उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए CJI ने कहा कि न्यायपालिका में तकनीकी पहलों की सफलता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि स्थापित प्रणालियां कितनी अत्याधुनिक हैं, बल्कि इससे मापी जानी चाहिए कि वे याचिकाकर्ताओं, वकीलों, न्यायाधीशों और नागरिकों के जीवन में कितना वास्तविक अंतर लाती हैं।
CJI सूर्य कांत
प्रमुख डिजिटल पहलों की शुरुआत
इस कार्यक्रम के दौरान झारखंड उच्च न्यायालय की कई महत्वपूर्ण तकनीकी और प्रशासनिक सुविधाओं का शुभारंभ किया गया।
- नया और उन्नत उच्च न्यायालय पोर्टल
- झारखंड की सिविल अदालतों के लिए ऑनलाइन प्रमाणित प्रति आवेदन सुविधा
- वकीलों के लिए पर्सनलाइज्ड कॉज लिस्ट
- न्यायिक कार्यों के लिए स्पीच-टू-टेक्स्ट सॉफ्टवेयर
CJI ने कहा कि आधुनिक अदालतें तेजी से डिजिटल रिकॉर्ड, इलेक्ट्रॉनिक संचार और समय पर सूचना की उपलब्धता पर निर्भर हैं। इसलिए न्याय वितरण प्रणाली में अधिक विश्वसनीयता और दक्षता सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक बुनियादी ढांचे का विकास जरूरी है।
साइबर सुरक्षा और डेटा संरक्षण
CJI ने रेखांकित किया कि तकनीकी प्रगति के साथ-साथ मजबूत साइबर सुरक्षा उपाय, विश्वसनीय बैकअप व्यवस्था, नियमित सिस्टम परीक्षण और पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित तकनीकी कर्मचारी होना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा, न्यायिक रिकॉर्ड में संवेदनशील जानकारी होती है और उन्हें अनधिकृत पहुंच, नुकसान और व्यवधान से सुरक्षित रखना जरूरी है।
तकनीक और AI की सीमाएं
मुख्य न्यायाधीश ने आगाह किया कि तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कानूनी शोध, दस्तावेजों और सूचना प्रबंधन में मदद कर सकते हैं, लेकिन वे पक्षों को निष्पक्ष रूप से सुनने, साक्ष्यों का आकलन करने और कानून के अनुसार विवादों को तय करने की एक जज की जिम्मेदारी की जगह नहीं ले सकते। गोपनीयता, सटीकता और मानवीय निगरानी हर तकनीकी पहल के केंद्र में होनी चाहिए।
3. 'डिजिटल डिवाइड' से बचने की चेतावनी
CJI ने इस बात पर भी जोर दिया कि डिजिटलाइजेशन के कारण उन लोगों के लिए नई बाधाएं पैदा नहीं होनी चाहिए जिनके पास डिजिटल साक्षरता, विश्वसनीय इंटरनेट कनेक्टिविटी या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का उपयोग करने की क्षमता नहीं है। डिजिटल सेवाओं का उद्देश्य न्याय तक पहुंच को व्यापक बनाना होना चाहिए, न कि पहले से ही वंचित लोगों को बाहर करना।
₹25 करोड़ की लागत से तैयार डेटा सेंटर
लगभग ₹25 करोड़ के निवेश से बनी इस प्रमुख डेटा सेंटर परियोजना से डिजिटल न्यायिक रिकॉर्ड और अदालती अनुप्रयोगों का समर्थन करने के लिए आवश्यक कंप्यूटिंग क्षमता, स्टोरेज, कनेक्टिविटी और सुरक्षा मिलेगी। CJI ने कहा कि इसका वास्तविक महत्व उपकरणों में नहीं, बल्कि न्यायिक रिकॉर्ड को संरक्षित करने और डिजिटल सेवाओं को मजबूत करने में है।
निचली अदालतों तक पहुंच
डिजिटल परिवर्तन को केवल उच्च न्यायालय तक सीमित न रखते हुए जिला अदालतों तक विस्तारित करने पर जोर दिया गया, क्योंकि अधिकांश नागरिक पहली बार न्याय प्रणाली से वहीं रूबरू होते हैं। ई-फाइलिंग और वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग जैसी सुविधाओं के बेहतर एकीकरण से पूरे राज्य में न्याय प्रणाली मजबूत होगी।
वकीलों और याचिकाकर्ताओं के लिए राहत
ऑनलाइन सर्टिफाइड कॉपी: अदालतों से दूर रहने वाले याचिकाकर्ताओं को अब प्रमाणित प्रतियों के लिए अनावश्यक यात्रा और खर्च नहीं उठाना पड़ेगा, जिससे समय की बचत होगी और पारदर्शिता बढ़ेगी। इससे वकीलों को अपने मामलों को खोजने, फ़िल्टर करने और आसानी से व्यवस्थित करने में मदद मिलेगी।
स्पीच-टू-टेक्स्ट सॉफ्टवेयर
यह तकनीक जजों और स्टाफ को फैसले और आदेश तैयार करने में मदद करेगी। हालांकि, CJI ने चेतावनी दी कि इसमें सटीकता (विशेषकर कानूनी शब्दावली और नामों के मामले में) का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए, क्योंकि गति कभी भी सटीकता की कीमत पर नहीं होनी चाहिए।
CJI सूर्यकांत ने अंत में कहा कि "तकनीक केवल एक साधन है और न्यायिक आधुनिकीकरण का अंतिम पैमाना यही होगा कि क्या याचिकाकर्ताओं के लिए अदालतों तक पहुँचना आसान हुआ, वकील अधिक कुशलता से तैयारी कर पाए, और जजों को अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में बेहतर समर्थन मिला।"
