उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव दुर्गा शंकर मिश्र ने खास बातचीत में अपनी जिंदगी से जुड़े मजेदार किस्से साझा किए। उन्होंने अपने 40 वर्षों के लंबे करियर में 'ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर' के निष्पक्ष सिद्धांत को अपना आधार स्तंभ बनाया और खुशी-खुशी उसी राह पर चलते रहे।
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव दुर्गा शंकर मिश्र
दुर्गा शंकर मिश्र ने टाइम्स नेटवर्क की वरिष्ठ पत्रकार डॉ. रमा सोलंकी के साथ बातचीत में मऊ के एक छोटे से गांव से निकलकर, रांची के स्कूल और ब्रह्मांड से जुड़ाव महसूस करने वाले रोचक किस्से सुनाए। पूर्व मुख्य सचिव ने रांची में पढ़ाई का किस्सा सुनाते हुए कहा कि जब मेरे पिताजी मुझे रांची छोड़ने आ रहे थे और पहुंचने में एक घंटा बचा था और उन्होंने इसके बारे में बताया तो मैं खूब रोने लगा था, क्योंकि उससे पहले मैं कभी परिवार से अलग नहीं रहा था... उस वक्त सामने बैठे पांडे दंपति, जो रांची में ही रहते थे, ने मुझे रोता देखा और उन्होंने पिताजी से बातचीत की।
पूर्व मुख्य सचिव ने आगे बताया कि उस वक्त पांडे जी ने पिताजी से पूछा तो उन्होंने बताया कि हम बेटे को छोड़ने जा रहे थे और ये रो रहा है। उसके बाद पांडे जी हमें अपने घर ले गए। उन्होंने रातभर हमें खूब कहानी सुनाई और पांडे जी की पत्नी ने अच्छे से खाना खिलाया। उन्होंने आगे 23 फरवरी, 1973 का दिन याद करते हुए कहा कि विकास विद्यालय ने ही मेरी नींव रखी...
ब्रह्मांड से कैसे कटा कनेक्शन?
उन्होंने आगे बताया कि पिताजी लंच तक हमारे साथ थे और फिर छोड़कर चले गए। मैं फिर रोने लगा... उस वक्त हमारे हाउस मास्टर राम एकबाल सिंह जी मुझे अपने साथ ले गए और उन्होंने मुझसे कहा कि मैं तुम्हारी बच्चों के साथ दोस्ती कराता हूं और मुझे गुरु मंत्र देने ले गए। उन्होंने बताया कि हाउस मास्टर राम एकबाल सिंह जी का अभी कुछ वक्त पहले ही निधन हुआ, वो मुझे अपने बच्चे की तरह मानते थे।
पूर्व मुख्य सचिव ने बताया कि हाउस मास्टर गुरु मंत्र देने के लिए मुझे एक कमरे में ले गए, वहां कमरे में ठाकुरजी (नाई) थे और मुझे कुर्सी में बैठा दिया, जिसके सामने शीशा लगा था और मैंने कभी ऐसा देखा भी नहीं था... बचपन में जब मैं छोटा था तो आधा इंच के बाल होते थे और कम से कम 9 इंच की चोटी होती थी... बचपन में नहा-धोकर, पूजा-पाठ करना और लगता था कि इसी चोटी से ही मैं ब्रह्मांड से जुड़ा हुआ हूं और सारी ताकत, पढ़ाई-लिखाई और ज्ञान उसी से आता है... तभी नाई ने मेरी चोटी काट दी और मैंने वहां रोना चालू कर दिया... मुझे लगा अब तो मैं बेवकूफ बन गया, मेरा ब्रह्मांड से जुड़ाव खत्म हो गया, लेकिन मैंने फिर धीरे-धीरे ढलना चालू कर दिया।
IAS बनने के बाद स्कूल मास्टर के लिए ले गए थे कपड़े
इस दौरान, पूर्व मुख्य सचिव ने अपने गांव के प्राइमरी स्कूल के मास्टर मिश्रीलाल जी को याद किया, जिनके लिए आईएएस बनने के बाद वह कपड़े लेकर गए थे। दुर्गा शंकर मिश्र ने बताया कि जब मेरा आईएएस में सलेक्शन हुआ था तो उन्होंने मुझे बहुत प्यार दिया था... वह अनुसूचित जाति के थे, लेकिन उनका बहुत सम्मान था और हमारे घर पर जब आते थे तो मिश्रीलाल जी जब तक बैठते नहीं थे तब तक हमारे पिताजी भी नहीं बैठते थे, उनका इतना ज्यादा सम्मान था।
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव दुर्गा शंकर मिश्र
उन्होंने कहा कि आईएएस में सलेक्शन के बाद जब मैं अपने गांव गया तो पहले देवता, मां-बाप को प्रणाम करने के बाद उनके (मिश्रालाल) घर चला गया, लेकिन वह मुझे वहां नहीं मिले तो उनके खेत चला गया... मुझे वह दृश्य आज भी याद है, वह नीचे बैठे हुए मुझे एकटक देखते रह गए और खड़े होकर रोते हुए मुझे ऐसे पकड़ लिया जैसे अपना बच्चा हूं...
हेड मास्टर ने सिखाया था स्वच्छ मिशन का पहला पाठ
उन्होंने कहा कि स्वच्छ भारत मिशन मैंने जो किया, उसका पहला पाठ मुझे मिश्रीलाल मास्टर ने सिखाया... उन्होंने बचपन में मुझे सिखाया था कि एक जगह खाकर मूंगफली, चने के छिल्ले को एक जगह रखो और उसे उठाकर कूंडेदान में डाल दो... ऐसी-ऐसी चीजें वह हमें सिखाते थे। वह प्राइमरी स्कूल के हेड मास्टर थे, वो छोटा सा एक कमरे का स्कूल था बाकी हम लोग पेड़ के नीचे पढ़ते थे, लेकिन उन्होंने हमें जो संस्कार दिए, वो हमेशा हमारे साथ रहे...
