मुंबई ट्रेन धमाके: आवाज, चीखें और अफरा-तफरी आज भी याद है, हर तरफ खून था...सभी 12 आरोपियों को बरी किए जाने पर पीड़ितों का छलका दर्द

बई की सात लोकल ट्रेनों में 11 जुलाई 2006 को हुए विस्फोटों में 180 से अधिक लोगों की जान गई थी और सैकड़ों घायल हुए थे। यह देश के सबसे भीषण आतंकी हमलों में से एक था।

Mumbai Bomb Blast Case: मुंबई की उपनगरीय लोकल ट्रेनों में 2006 में हुए श्रृंखलाबद्ध विस्फोटों के मामले में बंबई हाई कोर्ट द्वारा सभी 12 आरोपियों को बरी किए जाने के बाद पीड़ितों ने इस फैसले पर गहरा आघात और निराशा जताई है। पीड़ितों का कहना है कि न्याय मिलने की उनकी 19 वर्षों की प्रतीक्षा अब और लंबी हो गई है। पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट और विस्फोट के समय छात्र रहे चिराग चौहान ने कहा, यह बेहद दुखद है। न्याय की हत्या हो गई। अब व्हीलचेयर का सहारा लेने वाले चौहान उस समय 21 वर्ष के थे जब 11 जुलाई 2006 को पश्चिम रेलवे की एक लोकल ट्रेन में खार और सांताक्रूज़ स्टेशनों के बीच हुए बम धमाके में उन्हें रीढ़ की गंभीर चोट लगी थी।

Train blast mumbai

2006 मुंबई ट्रेन ब्लास्ट के सभी आरोपी रिहा, पीड़ितों का छलका दर्द (PTI)

मोदी प्रधानमंत्री होते, तो संभवतः न्याय मिला होता

चौहान ने कहा कि उन्होंने दोषियों को माफ कर आगे बढ़ने का प्रयास किया। उन्होंने यह भी कहा कि अगर उस समय नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री होते, तो संभवतः न्याय मिला होता। उन्होंने मई में ऑपरेशन सिन्दूर के ज़रिए भारत की जवाबी कार्रवाई का भी हवाला दिया। बंबई हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में पूरी तरह विफल रहा और विश्वास करना कठिन है कि अभियुक्तों ने अपराध किया। एक अन्य पीड़ित, पश्चिम रेलवे में कार्यरत महेन्द्र पितले (52) ने भी फैसले से असहमति जताई। विस्फोट में अपना बायां हाथ खो बैठे पितले ने कहा, अगर ये आरोपी दोषी नहीं हैं, तो फिर यह भयावह कृत्य किसने किया? सिर्फ पुलिस और न्यायपालिका ही जानते हैं।

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