वरिष्ठ वकील और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने CBSE परीक्षा मूल्यांकन प्रणाली, NEET पेपर लीक विवाद और सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला।दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए कपिल सिब्बल ने कहा कि बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है और शिक्षा व्यवस्था में गंभीर खामियां सामने आई हैं।
ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम पर कपिल सिब्बल के आरोप (फाइल फोटो)
17 लाख छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़
सिब्बल ने कहा कि इस साल CBSE की 12वीं परीक्षा में करीब 17 लाख 80 हजार छात्रों ने हिस्सा लिया, लेकिन मूल्यांकन प्रक्रिया में भारी गड़बड़ियां हुईं। उन्होंने कहा, “बच्चे मेहनत करते हैं, माता-पिता मेहनत करते हैं। तमाम दबाव के बीच रहते हैं और भविष्य को लेकर चिंतित रहते हैं। लेकिन CBSE का जो रवैया है, वह बेहद चिंताजनक है।” उन्होंने आरोप लगाया कि सीबीएसई ने इस बार ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम अपनाया, जिसके तहत उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन करके शिक्षकों को भेजा गया, लेकिन प्रक्रिया सही तरीके से लागू नहीं हुई। सिब्बल के मुताबिक न ही कॉपियां ठीक से स्कैन नहीं हुईं शिक्षकों को पर्याप्त ट्रेनिंग नहीं दी गई। यहाँ तक कि स्कैन की गई कॉपियां पढ़ने लायक नहीं थीं, जिससे मूल्यांकन प्रक्रिया प्रभावित हुई।
उन्होंने कहा कि इसी वजह से इस बार पास प्रतिशत घटकर 85.02 फीसदी रह गया।
री-चेकिंग के लिए भी पैसे मांगे जा रहे
सिब्बल ने कहा कि सीबीएसई दोबारा कॉपियां जांचने के लिए तो तैयार हो गया, लेकिन शिक्षक अब भी स्कैन की गई कॉपियां ठीक से पढ़ नहीं पा रहे हैं।उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि रिजल्ट देखने के दौरान वेबसाइट क्रैश हो गई। उन्होंने कहा, “देश को विकसित भारत की तरफ ले जाने की बात हो रही है, लेकिन वेबसाइट क्रैश हो रही है, कॉपियां ठीक से स्कैन नहीं हो रहीं और बच्चों के भविष्य के साथ प्रयोग किया जा रहा है।” सिब्बल ने कहा कि री-चेकिंग के लिए छात्रों से पैसे मांगना भी गलत है।
NEET पेपर लीक पर भी उठाए सवाल
सिब्बल ने NEET परीक्षा विवाद को लेकर भी सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, “22 लाख बच्चों के साथ क्या हुआ? अधिकारी कहते हैं कि पूरा पेपर लीक नहीं हुआ था, सिर्फ कुछ सवाल लीक हुए थे। क्या उन्हें मालूम है कि लीक का मतलब भी क्या होता है?” उन्होंने कहा कि “थोड़ा लीक” जैसी कोई चीज नहीं होती और कुछ नंबरों से भी छात्रों के भविष्य पर असर पड़ता है। सिब्बल ने कहा, “अगर UPA सरकार के समय ऐसी स्थिति होती तो मंत्री इस्तीफा दे देते। अब इस्तीफे की मांग का शायद कोई फायदा नहीं, लेकिन कम से कम जिम्मेदारी तो तय होनी चाहिए।”
सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने पर भी उठाए सवाल
कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाए जाने के फैसले पर भी सवाल उठाए। कहा अध्यादेश के जरिए जजों की संख्या बढ़ाना अपारदर्शी और अलोकतांत्रिक तरीका है। उन्होंने कहा कि अब चीफ जस्टिस को मिलाकर सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 38 हो गई है, लेकिन यह फैसला अध्यादेश के जरिए किया गया। सिब्बल ने कहा कि संसद के मानसून सत्र से पहले अगर नियुक्तियां हो जाती हैं, तो अध्यादेश की वैधानिकता पूरी हो जाएगी, लेकिन इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर संसद में चर्चा होनी चाहिए थी।
सुप्रीम कोर्ट की हर बेंच अलग राय देती है
सिब्बल ने कहा कि जब उन्होंने 1977 से पहले वकालत शुरू की थी, तब सुप्रीम कोर्ट में सिर्फ 13 जज थे, जबकि अब संख्या 38 तक पहुंच गई है। उन्होंने कहा कि मुकदमों की संख्या बढ़ने की बड़ी वजह नए कानून और बढ़ती याचिकाएं हैं। उन्होंने कहा जमानत समेत कई मामलों में लगातार याचिकाएं दाखिल हो रही हैं। बिना कानूनी आधार के जनहित याचिकाओं की संख्या बहुत बढ़ गई है।कई PIL अब “पब्लिक इंटरेस्ट” नहीं बल्कि “प्राइवेट इंटरेस्ट” बन गई हैं। सिब्बल ने कहा कि सिर्फ जजों की संख्या बढ़ाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। उन्होंने कहा, “या तो सुप्रीम कोर्ट का जूरिडिक्शन कम किया जाए या वैकल्पिक विवाद समाधान के रास्ते मजबूत किए जाएं।” सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट की विभिन्न बेंचों के अलग-अलग फैसलों पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा, “सुप्रीम कोर्ट एक संवैधानिक अदालत है, लेकिन हर बेंच की राय अलग होती है। जितनी बेंच, उतने सुप्रीम कोर्ट हो गए हैं।” उन्होंने कहा कि बिना व्यापक चर्चा के जजों की संख्या बढ़ाने से शंकाएं पैदा होंगी और बाद में आरोप लगेंगे कि “अपने जज लगाए जा रहे हैं।” सिब्बल ने कहा कि इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जजों, वरिष्ठ वकीलों और विशेषज्ञों से व्यापक चर्चा होनी चाहिए थी।
