क्या धन, उसका स्रोत और उद्देश्य, न्यायिक प्रणाली को कर रहा है भ्रष्ट? नकदी बरामदगी मामले में उपराष्ट्रपति का गंभीर सवाल

भारत मंडपम में हुए इस कार्यक्रम में उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कहा, “एक मजबूत न्यायिक व्यवस्था लोकतंत्र के अस्तित्व और उसकी समृद्धि के लिए अनिवार्य है। यदि कोई एक घटना इस व्यवस्था को कलंकित करती है, तो हमारी पवित्र जिम्मेदारी है कि हम जल्द से जल्द सच सामने लाएं। देश में जांच कार्यपालिका का कार्य है, और न्यायिक निर्णय न्यायपालिका का क्षेत्र।

भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने सोमवार को कहा कि '1991 के ‘के. वीरस्वामी निर्णय’ पर अब पुनर्विचार करने का समय आ गया है। उन्होंने अपने संबोधन में कहा, 'इस अभेद्य सुरक्षा कवच की उत्पत्ति सुप्रीम कोर्ट के के. वीरस्वामी निर्णय (1991) से हुई है। यदि मैं कहूं... यह एक तरह का 'न्यायिक चातुर्य' है। आमतौर पर यह शब्द विधायिका के लिए इस्तेमाल होता है, सही कह रहा हूं न? इसने जवाबदेही और पारदर्शिता की हर कोशिश को निष्प्रभावी करते हुए, दण्डमुक्ति का ढांचा खड़ा कर दिया है। अब समय आ गया है कि इसमें बदलाव हो। और मुझे पूर्ण विश्वास है कि वर्तमान सुप्रीम कोर्ट –जो कि प्रतिष्ठित, ईमानदार लोगों से बना है – वह यह बदलाव करेगा। वर्तमान मुख्य न्यायाधीश ने बहुत कम समय में ऐसा भरोसा जगाया है जिससे आम जनता को राहत महसूस हो रही है।'

Dhankhar

नकदी बरामदगी मामले में उपराष्ट्रपति का गंभीर सवाल।

उन्होंने अपने सम्बोधन में आगे कहा, 'हमें न्यायपालिका की रक्षा करनी होगी। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे न्यायाधीश भयमुक्त होकर निर्णय ले सकें। वे सबसे कठिन कार्य करते हैं – कार्यपालिका की शक्तियों से निपटना, उद्योग की शक्तियों से जूझना, आर्थिक और संस्थागत ताकतों से टकराना। इसलिए हमें उन्हें मजबूत सुरक्षा देनी चाहिए। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि न्यायाधीश किसी भी प्रकार की साजिश या दुर्भावनापूर्ण आरोपों से अछूते रहें। इसके लिए एक पारदर्शी, उत्तरदायी और तेज़ इन-हाउस जांच प्रणाली विकसित की जानी चाहिए, जो न्यायाधीशों द्वारा अपने साथियों की जांच करने की मानसिकता से मुक्त हो।'

End of Feed