ईरान-इजरायल के बीच जारी संघर्ष के बीच तमाम प्रतिक्रियायें सामने आ रही हैं, वहीं कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने इसको लेकर कहा है- 'हमें ईरान के साथ खड़ा होना चाहिए। ईरान हमारा पुराना दोस्त है। हमारे उनके साथ व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंध हैं...इसलिए हमें ईरान के साथ मजबूती से खड़ा होना चाहिए। ईरान ने हमेशा हर तरह से हमारा साथ दिया है। इसलिए हमें इस मुश्किल समय में ईरान के साथ खड़ा दिखना चाहिए...
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद बोले- 'ईरान पर हमला पूरी तरह से 'दादागिरी'
'यह पूरी तरह से 'दादागिरी' है'
उन्होंने कहा कि 'ईरान ने हमला नहीं किया। हमला ईरान पर ही हुआ है। ईरान ने कहा कि उसके सभी परमाणु कार्यक्रम अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की निगरानी में हैं और आप आकर उनका निरीक्षण कर सकते हैं। इसके बावजूद उस पर हमला किया जा रहा है। तो यह पूरी तरह से 'दादागिरी' है। सभी को इस 'दादागिरी' के खिलाफ एकजुट होना चाहिए और जवाब देना चाहिए...'
वहीं इससे पहले कांग्रेस ने सोमवार को कहा कि मोदी सरकार ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर अमेरिकी हमले तथा 'इजराइली आक्रामकता' की आलोचना या निंदा नहीं की है और वह गाजा में 'नरसंहार' पर भी चुप है।मुख्य विपक्षी दल के महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि अब सरकार को पहले की तुलना में अधिक नैतिक साहस का परिचय देना चाहिए।उनका यह भी कहना है कि ईरान के साथ कूटनीतिक बातचीत होनी चाहिए।
रमेश ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, 'ईरान पर अमेरिकी वायुसेना की ताकत का इस्तेमाल करने का राष्ट्रपति ट्रंप का निर्णय ईरान के साथ बातचीत जारी रखने के उनके अपने आह्वान का मज़ाक है।'उन्होंने कहा कि कांग्रेस, ईरान के साथ तत्काल कूटनीति और बातचीत की अनिवार्यता को दोहराती है।कांग्रेस नेता ने कहा, 'भारत सरकार को अब तक की तुलना में अधिक नैतिक साहस का प्रदर्शन करना चाहिए।
उन्होंने दावा किया, 'मोदी सरकार ने स्पष्ट रूप से अमेरिकी बमबारी और इजराइल की आक्रामकता, बमबारी और लक्षित हत्याओं की न तो आलोचना की है और न ही निंदा की है। इसने गाजा में फ़लस्तीनियों पर किए जा रहे नरसंहार पर भी चुप्पी साध रखी है।'
इससे पहले, कांग्रेस संसदीय दल की प्रमुख सोनिया गांधी ने बीते शनिवार को आरोप लगाया था कि मोदी सरकार ने गाजा की स्थिति और इजराइल-ईरान सैन्य संघर्ष पर चुप्पी साधते हुए भारत के सैद्धांतिक रुख और मूल्यों को त्याग दिया है।उन्होंने यह भी कहा था कि सरकार को आवाज बुलंद करनी चाहिए और पश्चिम एशिया में संवाद को प्रोत्साहित करने के लिए उपलब्ध हर राजनयिक मंच का उपयोग करना चाहिए।
