'1954 से खुला है लिपुलेख रास्ता'; कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर नेपाल ने अलापा लिपुलेख राग, भारत ने दिया सख्त जवाब

नेपाल ने भारत और चीन द्वारा जून से अगस्त के बीच प्रस्तावित कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए लिपुलेख मार्ग तय किए जाने पर आपत्ति जताई है।उसने कहा है कि यह उसका क्षेत्र है। इसके जवाब में भारत ने अब दो टूक कहा है कि यह मार्ग दशकों से उपयोग में है और भारत की स्थिति पहले जैसी ही कायम है।

भारत विरोधी रुख रखने वाले बालेन शाह की सरकार बनते ही नेपाल बड़बोलापन दिखाने लगा है। भारतीय बाजारों से सामान खरीदने पर भंसार नियम को सख्त करने के बाद अब बालेन सरकार ने भारत और चीन द्वारा आगामी कैलाश मानसरोवर यात्रा को लिपुलेख दर्रे के रास्ते से कराने की योजना पर आपत्ति जताई है। नेपाल ने दावा किया है कि लिपुलेख दर्रे वाला हिस्सा उसका स्वायत्त क्षेत्र है।

लिपुलेख दर्रे के रास्ते को लेकर नेपाल ने दिखाया बड़बोलापन।

लिपुलेख दर्रे के रास्ते को लेकर नेपाल ने दिखाया बड़बोलापन।

नेपाल ने कहा कि मानसरोवर यात्रा के लिए इस मार्ग को अंतिम रूप देने से पहले नेपाल सरकार से कोई परामर्श नहीं किया गया। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने रविवार को जारी बयान में कहा कि लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी महाकाली नदी के पूर्व में स्थित नेपाल के अभिन्न हिस्से हैं। नेपाल ने यह दावा 1816 की सुगौली संधि के आधार पर किया। वहीं, भारत ने उसके इस दावे पर प्रतिक्रिया दी है। विदेश मंत्रालय (MEA) के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि इस मुद्दे पर भारत का रुख हमेशा से स्पष्ट और स्थिर रहा है। उन्होंने कहा कि 1954 से कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए लंबे समय से लिपुलेख दर्रे के रास्ते का इस्तेमाल होता आया मार्ग है और इस रास्ते से यात्रा दशकों से जारी है। इसलिए इसे किसी नई घटना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

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